आज के दिन ही हम एक हुए थे....कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया, याद ही नहीं। लगता है कल की ही तो बात थी........ अहसास कभी उम्र नहीं पाते , कितनी सच्ची बात है ये। जीवन की ऊंची-नीची डगर पर चलते हुए कब एक अजनबी इतना अपना हो जाता है पता ही नहीं चलता.... ..... सुख-दुख के साझेदार हुए, जीवनभर के साथ हुए। कानों में संगम के गीत प्रिये, तुम तो मेरे मीत प्रिये। आंसुओं से भीगे हुए, पलकों पर कुछ अद्भुत सपने, हमने जो आँखों में समां लिए, तुम तो मेरे मीत प्रिये। उजियाले का अधिकार लिए, मिटा तम के आकर्षण प्रिये। ढलते सूरज को दे आवाज़, हर हार को निरस्त करके, मुश्किलों में मुस्कान लिए, तुम तो मेरे मीत प्रिये। इस जीवन के गीतों के स्वर नहीं आसान प्रिये, जहां मिले स्वर हमारा मधुर वही संगीत प्रिये। चलते रहे अगर साथ यूं ही, हर मुश्किल है आसान प्रिये, तुम तो मेरे मीत प्रिये, जीवन का संगीत प्रिये.
टिप्पणियाँ
Aapki sabhi rachnayen sulajhi huee....anbhavse tarashe huee..hoti hain..
आहिस्ते -आहिस्ते
आज फिसल गया ,
बहुत अच्छे भाव, इसी तरह बहुत कुछ पीछे छोड़कर हम आगे बढ़ते जाता हैं।
बहुत कुछ याद रक्खा ,
सहेजते -सहेजते
क्या कुछ न गवा दिया ,
बहुत सुंदर लिखा आप ने, बहुत गहरे भाव.
धन्यवाद
Khatas par aapakee tippanee ka intzar hai .
और याद बनकर
अतीत ठहर गया ।nice
क्या ज्योति जी इतनी मुश्किल से बाहर आ पाती हूँ और आप हैं कि फिर वहीँ भेज देती हैं
बहुत कुछ याद रक्खा ,
सहेजते -सहेजते
क्या कुछ न गवा दिया ,
जो वक्त पकड़ सका
वो संभल गया ,
जो मन न सह सका
वो पिघल गया ,
रेत की तरह
आहिस्ते -आहिस्ते
आज फिसल गया ,
और याद बनकर
अतीत ठहर गया ।
बहुत सादगी और सरलता के साथ जिन्दगी की गहराई को नापती रचना ... बहुत सुन्दर.... बधाई
बहुत कुछ याद रक्खा ,
सहेजते -सहेजते
क्या कुछ न गवा दिया ,
बहुत गहरे भाव हैं.
महावीर शर्मा
विचारों की उथल पुथल के लिये उपयुक्त शब्दों का चयन किया है आपने.
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
अच्छी रचना