धरती की हूँ मैं धूल लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप अप्रैल 10, 2021 धरती की हूँ मै धूलगगन को कैसे चूम पाऊँगीउड़ाये जितनी भी आंधियाँतो भी आकाश न छू पाऊंगी जुड़ी हुई हूँ मै जमीन सेकिस तरह यह नाता तोडू ,अम्बर की चाहत में बतलाकिस तरह यह दामन छोड़ू ।☂️☂️☂️☂️☂️☂️☂️☂️☂️☂️☂️ लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप टिप्पणियाँ संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा… जमा के रखो पैर ज़मीं पर जो आँधियाँ न उड़ा सकें हौसला इतना हो मन में कि गगन चूम सकें ।मैथली शरण गुप्त जी ने कहा है कि नर हो न निराश करो मन को ज्योति सिंह ने कहा… हार्दिक आभार जिज्ञासा सिंह ने कहा… सच में जमीन से जुड़ी हुई सुंदर रचना । Amit Gaur ने कहा… आप की पोस्ट बहुत अच्छी है आप अपनी रचना यहाँ भी प्राकाशित कर सकते हैं, व महान रचनाकरो की प्रसिद्ध रचना पढ सकते हैं। विश्वमोहन ने कहा… बहुत ही सुंदर रचना!!! Zee Talwara ने कहा… बहुत ही सुंदर रचना!!! Free me Download krein: Mahadev Photo
टिप्पणियाँ
जो आँधियाँ न उड़ा सकें
हौसला इतना हो मन में
कि गगन चूम सकें ।
मैथली शरण गुप्त जी ने कहा है कि नर हो न निराश करो मन को