मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

ये चाँद उतर कर जमीं पर तो आ..

चाँद
ऐ चाँद 
उतर कर कभी 
जमीं पर तो आ 
तंग गलियों के
बंद घरों की
गंदी बस्तियों में
आकर तू
फेरे तो लगा 
देख आँखों में
पलती हुई बेबसी 
बंद गलियों में
दम तोड़ती जिंदगी
जीने मरने की 
उम्मीद लिये
सिसकती जिंदगी
आँखों में कटती 
चुभती रातें 
होंठो पे अटकी
अनकही बातें 
देख दिल के गहरे दाग यहाँ 
सुन सबके अपने हाल यहाँ 
तू भी तो आँसुओं मे नहा 
तू भी तो दुख में  मुस्कुरा
अरे तू 
छुप गया कहाँ
चाँदनी से निकल
सामने तो आ
कई रिश्ते निभाये है
तूने हमसे 
अब मसीहा बनकर भी 
तू हमें दिखा 
ऐ चाँद उतर कर
जमीं पर तो आ.. .।


गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

ईसा मसीह

ईसा जब जब तुम्हे 
यू सूली पर 
लटका हुआ देखती हूँ 
तब तब तुम्हारे बारे में 
सोचने लगती हूँ 
और तुमसे ये 
पूछ ही बैठती हूँ 
ईसा तुम 
अच्छाई को ठुकते 
देख रहे थे
ऊपर से चेहरे पर 
हँसी लिए हुए 
मुस्कुरा भी रहे थे 
और सुनते हैं 
उन जल्लादो पर भी
तरस खा रहे थे तुम
जो तुमको सूली पर
बड़ी बेरहमी से चढ़ा रहे थे,
जहाँ बातों से मन 
छलनी हो  जाता हैं
वहाँ कील से 
ठोके जाने पर
रक्त के बहते रहने पर
पीड़ा तुम्हारी असहनीय तो 
हो ही रही होगी
फिर भी तुम 
सारी वेदनाये 
व्यथा, तकलीफ 
आसानी से सहते गये , 
इन हालातों में भी
अपने दर्द को महसूस करने 
और अपने  ऊपर तरस 
खाने की बजाय 
उन जल्लादो पर 
तरस खा रहे थे 
जो जान बूझकर तुम्हे 
कष्ट पहुंचा रहे थे
तुम्हारी अच्छाई का तिरस्कार
खून कर रहे थे, 
सचमुच तुम महान थे 
जो कातिल को 
बुरा भला कहने और
उन्हे सजा सुनाने की बजाय 
उनके लिए दुआ मांग रहे थे, 
जो सब सहकर भी
हँसते हुए 
सूली पर लटक जाये 
वो ईसा ही हो सकता है, 
और तुम ईसा थे 
तभी तुम ईसा थे l

 



शनिवार, 4 जुलाई 2020

ख्वाब

ख्वाब ...


ख्वाब एक
निराधार
बेल की तरह,
बेलगाम
ख्याल की तरह ,
असहाय डोलती
कल्पना है ,
जो हर वक़्त
कब्र खोद कर ही
ऊँची उड़ान भरती है ,
क्योंकि
उसका दम तोड़ना
निश्चित है ।

मंगलवार, 30 जून 2020

संगत ........


स्वाती की बूँद का

निश्छल निर्मल रूप ,

पर जिस संगत में

समा गई

ढल गई उसी अनुरूप ।

केले की अंजलि में

रही वही निर्मल बूँद ,

अंक में बैठी सीप के

किया धारण

मोती का रूप ,

और गई ज्यो

संपर्क में सर्प के

हो गई विष स्वरुप ।

मनुष्य आचरण जन्म से

कदापि , होता नही कुरूप ,

ढलता जिस साँचे में

बनता उसका प्रतिरूप ।

शनिवार, 27 जून 2020

मानवता का स्वप्न


मानवता का स्वप्न

कैसा दुर्भाग्य ? तेरा भाग्य

सर्वोदय की कल्पना ,

बुनता हुआ विचार,

स्वर्णिम कल्पना को आकार देता ,

खंडित करता , फिर

उधेड़ देता लोगों का विश्वास ,

नवोदय का आधार

फिर भी आंखों में अन्धकार ।

इच्छाओं की साँस का

घोटता हुआ दम ,

अन्तः मन का द्वंद प्रतिक्षण ।

भाव - विह्वल हो कांपता ,

अकुलाता भ्रमित - स्पर्श ,

टूट कर भी निःशब्द ,

मानवता का 'स्वप्न '

बुधवार, 24 जून 2020

शिल्प-जतन


नीव उठाते वक़्त ही
कुछ पत्थर थे कम ,
तभी हिलने लगा
निर्मित स्वप्न निकेतन ।
उभर उठी दरारे भी व
बिखर गये कण -कण ,
लगी कांपने खिड़की
सुनकर भू -कंपन ,
दरवाजे भी सहम गये
थाम कर फिर धड़कन ।
टूट रहे थे धीरे धीरे
सारे गठबंधन
आस और विश्वास का
घुटने लगा दम
जरा सी चूक में
लगे टूटने सब बंधन ,
शिल्पी यदि जतन करता ,
लगाता स्नेह और
समानता का गारा ,
तब दीवारे भी बच जाती
दरकने से 
छत भी बच जाती
चटकने से और
आंगन सूना न होता
संभल जाता ये भवन ।

सोमवार, 22 जून 2020

कुछ बूंदे कुछ फुहार


______________________________
कुछ बूंदे कुछ फुआर

तफसीर जब बेबसी का हुआ 
त्यों ही मुलाकात आंसुओ ने किया ,
आगाज़ होते किस्से गमे-तफसील के साथ 
पहले उसके अश्को ने गला रुंधा दिया । 
_______________________________
जिसके चेहरे पे थी हँसी ,
वो भी थे उदासी का सबब लिए हुए । 
कौन कहता है कमबख्त ,
है गम नही सबको घेरे हुए । 
_______________________
छेड़कर ज़िक्र तो करो 
रखकर दुखती - रग पर हाथ ,
जख्म उभरता नही फिर कैसे 
सोये हुए दर्द के साथ । 
________________________
उकता गए ज़िन्दगी तेरी सज़ा से ,
अब तो इस क़ैद से रिहा कर दे । 
_______________________
तलाशे कहाँ सुकून ऐसी जगह बता दे ,
बेवज़ह दर्द बढ़ाने की अब जगह न दे । 
___________________________