गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

ईसा मसीह

ईसा जब जब तुम्हे 
यू सूली पर 
लटका हुआ देखती हूँ 
तब तब तुम्हारे बारे में 
सोचने लगती हूँ 
और तुमसे ये 
पूछ ही बैठती हूँ 
ईसा तुम 
अच्छाई को ठुकते 
देख रहे थे
ऊपर से चेहरे पर 
हँसी लिए हुए 
मुस्कुरा भी रहे थे 
और सुनते हैं 
उन जल्लादो पर भी
तरस खा रहे थे तुम
जो तुमको सूली पर
बड़ी बेरहमी से चढ़ा रहे थे,
जहाँ बातों से मन 
छलनी हो  जाता हैं
वहाँ कील से 
ठोके जाने पर
रक्त के बहते रहने पर
पीड़ा तुम्हारी असहनीय तो 
हो ही रही होगी
फिर भी तुम 
सारी वेदनाये 
व्यथा, तकलीफ 
आसानी से सहते गये , 
इन हालातों में भी
अपने दर्द को महसूस करने 
और अपने  ऊपर तरस 
खाने की बजाय 
उन जल्लादो पर 
तरस खा रहे थे 
जो जान बूझकर तुम्हे 
कष्ट पहुंचा रहे थे
तुम्हारी अच्छाई का तिरस्कार
खून कर रहे थे, 
सचमुच तुम महान थे 
जो कातिल को 
बुरा भला कहने और
उन्हे सजा सुनाने की बजाय 
उनके लिए दुआ मांग रहे थे, 
जो सब सहकर भी
हँसते हुए 
सूली पर लटक जाये 
वो ईसा ही हो सकता है, 
और तुम ईसा थे 
तभी तुम ईसा थे l

 



9 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 25 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२६-१२-२०२०) को 'यादें' (चर्चा अंक- ३९२७) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी

ज्योति सिंह ने कहा…

Digvijay ji अनिता जी हार्दिक आभार और धन्यबाद, नमन

Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल ने कहा…

बहुत ही गहनता से ईसा मसीह का जीवन दर्शन प्रस्तुत किया गया - - सुन्दर रचना।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर सृजन

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुंदर रचना

Amrita Tanmay ने कहा…

उनकी पूजा ही प्रमाण है । अति सुन्दर भाव ।

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सुंदर सार्थक चिंतन देती रचना।