गुरुवार, 18 जून 2020

ख्वाहिशों को रास्ता दूँ

आज सोचा चलो अपनी

ख्वाहिशो को रास्ता दूँ ,

राहो से पत्थर हटाकर

उसे अपनी मंजिल छूने दूँ ,

मगर कुछ ही दूर पर


सामने पर्वत खड़ा था

अपनी जिद्द लिए अड़ा था ,

उसका दिल कहाँ पिघलता

वो मुझ जैसा इंसान नही था ,

स्वप्न उसकी निष्ठुरता पर 

खिलखिलाकर हँस पड़े ,

हो बेजान , अहसास क्या समझोगे

हद क्या है जूनून की ,कैसे जानोगे ?

आज न सही कल पार कर जायेंगे

उड़ान भर कर आगे निकल  जायेंगे ।

11 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

मिलेगा रास्ता हौसलों से

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत रचना।

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(२० -०६-२०२०) को 'ख्वाहिशो को रास्ता दूँ' (चर्चा अंक-३७३८) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सतत प्रयास होगा तो निश्चित जीत आगे खाड़ी होगी ... कुछ भी डिगा नहि पाएगा होंसले को ...

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर।

hindiguru ने कहा…

बढ़िया

Sarita sail ने कहा…

सुंदर रचना

Onkar ने कहा…

बहुत बढ़िया

अनीता सैनी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Meena Bhardwaj ने कहा…

आज सोचा चलो अपनी
ख्वाहिशो को रास्ता दूँ ,
राहो से पत्थर हटाकर
उसे अपनी मंजिल छूने दूँ ,..
वाह!बहुत खूब !ख़्वाहिशों की राह के पत्थर हटने पर ही लक्ष्य साधना सफल होगी ।

Enoxo ने कहा…

दिल को छूने वाली रचना