संदेश

बेलगाम ख्यालो .....

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हर क्षण , हर पल फैसले यहाँ बदलते है । ज़िन्दगी जीने की चाह भी कितने रंग में ढलती है । अस्थाई ख्वाहिशों के महल निराधार ही होते है । बेलगाम ख्यालो के संग फिर भी हवाओ में सफर तय करते है ।

रंगीला हिन्दुस्तान

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जब कभी समाचार देखती हूं, या खाली बैठती हूं, देश की स्थिति का मुआयना करने लगती हूं, और सोचती हूं, कुछ लिखूं। अपने रंगीले हिन्दुस्तान पर पर जब लिखने बैठती हूं शब्द तब मौन हो जाते हैं, सारे और तस्वीर सभी एक एक कर सामने आकर बोलने लगतीं है अपनी हालत दर्शाने लगती हैं- और कहती है- क्या लिखोगे? इतनी शब्द और शक्ति है, तुम्हारी इस कलम के पास? जो कैद कर दे सब, तुम्हारे कुछ पलों में। नही कर पाओगे अगर आवाज़ उठाओगे तो हार जाओगे या बिक जाओगे। ये कलम आध में ही दम तोड़ देगी, मंजिल तक ले जाना मुमकिन नहीं। इसलिये खयाल छोड़ो क्रांतिकारी विचार तोड़ो बड़ी खुशी से पन्द्रह अगस्त पर झंडे को सलाम ठोंको सच्चे और देश प्रेमी होने का फ़र्ज़ अदा करो। जय हिन्द .

दर्द ..

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आहिस्ता - आहिस्ता दर्द घर में पैर जमाता रहा _ और कुछ हल्की कुछ गहरी छाप अपनी शक्ल की छोड़ता रहा । हम इसकी आमद से घबराते रहे , ये अपना राज फैलाता रहा ।

जियो और जीने दो ....

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बात अपनी होती है तब जीने की उम्मीद को रास्ते देने की सोचते है वो , बात जहाँ औरो के जीने की होती है , वहाँ उनकी उम्मीद को सूली पर लटका बड़े ही आहिस्ते -आहिस्ते कील ठोकते हुये दम घोटने पर मजबूर करते है । रास्ते के रोड़े , हटाने की जगह बिखेरते क्यों रहते हैं ? ........................................ इसका शीर्षक कुछ और है मगर यहाँ मैं बदल दी हूँ क्योंकि यह एक सन्देश है उनके लिए जो किसी भी अच्छे कार्य में सहयोग देने की जगह रोक -टोक करना ज्यादा पसंद करते .

शिल्प -जतन

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नीव उठाते वक़्त ही कुछ पत्थर थे कम , तभी हिलने लगा निर्मित स्वप्न निकेतन । उभर उठी दरारे भी व बिखर गये कण - कण , लगी कांपने खिड़की सुनकर भू - कंपन , दरवाजे भी सहम गये थाम कर फिर धड़कन । जरा सी चूक में टूट रहे सब बंधन , शिल्पी यदि जतन करता , लगाता स्नेह और समानता का गारा , तब दीवारे बच जाती दरकने से और संभल जाता ये भवन ।

पत्थरों का ये स्रोत ..

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क्या लिखूं क्या कहूं ? असमंजस में हूँ , सिर्फ मौन होकर निहार रही बड़े गौर से पत्थर के  छोटे - छोटे टुकड़े , जो तुमने बिखेर दिये है मेरे चारो तरफ , और सोच रही हूँ कैसे बीनूँ इनको ? एक लम्बा पथ तुम्हे बुहार कर दिया था , मैंने और तुमने उसे जाम कर दिया कंकड़ पत्थर से । पर यहाँ सहनशीलता है कर्मठता है और है इन्तजार करने की शक्ति , ठीक है , तुम बिखेरो हम हटाये , आखिर कभी तो हार जाओगे , और बिखरे पत्थर सहेजने आओगे , और खत्म होगा पत्थरों का ये स्रोत । ""''"""""""""""""""""""" मौन होकर निहार रही हूँ  तेरे बिखेरे पत्थरों को ... मैं तो फिर भी चल लुंगी  कभी जो चुभ जाये तेरे ही पैरों में  पुकार लेना .... शायद तुम वो दर्द  सहन न कर पो .....

संगत

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स्वाती की बूँद का निश्छल निर्मल रूप , पर जिस संगत में समा गई ढल गई उसी अनुरूप । केले की अंजलि में रही वही निर्मल बूँद , अंक में बैठी सीप के किया धारण मोती का रूप , और गई ज्यो संपर्क में सर्प के हो गई विष स्वरुप । मनुष्य आचरण जन्म से कदापि , होता नही कुरूप , ढलता जिस साँचे में बनता उसका प्रतिरूप ।