सोमवार, 29 जून 2009

शिकवा

उम्र गुज़र जाती है सबकी
लिए एक ही बात ,
सबको देते जाते है हम
आँचल भर सौगात ,
फिर भी खाली होता है
क्यो अपने में आज ?
रिक्त रहा जीवन का पन्ना
जाने क्या है राज ?
रहस्य भरा कैसा अद्भुत
होता है , क्यो अहसास ?
रोमांचक किस्से सा अनुभव
इस लेन-देन के साथ ,
गिले -शिकवे की अपूर्णता पे ,
घिरा रहा मन हर बार ।

गुरुवार, 25 जून 2009

जीवन -धारा

क्या पता क्या ख़बर
क्या सही ,है क्या ग़लत ,
बहती ज़िन्दगी की धारा में
राज छिपे है बहुत ,
लिए पाप -पुण्य का चक्र
झूठ -सच का व्यूह ,
थोडी महकी थोडी बहकी
कुछ सहमी कुछ गुमसुम ,
कुछ अल्हड़ कुछ मदमस्त
स्नेह-सुरा का उदगार करता स्पर्श ,
कभी दहकता हुआ मन
और बरसता कभी सावन ,
लिए उर में कभी अवसाद घनेरा
पूर्ण -अपूर्ण के छंदों पर
होता खड़ा बसेरा ।
ज़िन्दगी की इस धारा में
है कितने ही मोड़ ,
हंस- हंस कर हमें महज
करते रहना है जोड़ ,
है पता किसे ,इसके गहरे राज़
कल क्या है ,क्या होगा आज ,
भूत - वर्त्तमान - भविष्य
लिए क्या है भाग्य ,
कोई क्या जाने ?
इस ज़िन्दगी के मौलिक आधार ।

मंगलवार, 23 जून 2009

असंभव कल्पना

पानी पर लकीर खींच रही हूँ ,
बात बनने की तसल्ली लिए
ना समझ बन रही हूँ ,
जल की धाराओ में
रास्ता देख रही हूँ ,
नादान बनकर लहरों पे
स्वप्न बुन रही हूँ ,
आपे से बाहर होकर
तारे तोड़ने की कोशिश आसमान से ,
इस तरह हर असंभव कल्पना को
साकार कर रही हूँ ।

सोमवार, 22 जून 2009

रविवार, 21 जून 2009

शाख के पत्ते

हम ऐसे शाख के पत्ते है
जो देकर छाया औरो को
ख़ुद ही तपते रहते है ,
दूर दराज़ तक छाया का
कोई अंश नही ,
फिर भी ख्वाबो को बुनते है
उम्मीदों की इमारत बनाते है ,
कल्पना से जब
हकीकत में आते है ,
ख्वाबो की वह बुलंद इमारत
बेदर्दी से ढह जाती है ,
हम अपनी तकदीर को
वही खड़े हो , फिर
कोसते रह जाते है ।

शुक्रवार, 19 जून 2009

गुजारिश

दुर्घटनाओ की उठी लहरों को
फना करो ,
आकांक्षा की वधू को
सँवरने दो ,
उठे न ऐसी आंधी कोई
कश्ती का रुख मोड़ दे ,
उमंग भरी मौज की कश्ती
साहिल पे आने दो ,
कारवां जब निगाहों में
जुस्तजू सिमटी हो बाँहों में ,
ऐसे खुशनुमा माहौल में
किसी तूफ़ान का ज़िक्र न करो ।

बुधवार, 17 जून 2009

अहसास..


ये रंग है प्यार का,
ये रंग है खुशी भरे जज्बात का,
ये रंग है,
अपने होने के अहसास का.

सोमवार, 15 जून 2009

नखरे बहार के

बेख्याल होकर गुजर गये
बेसबब ही यहाँ जी गये ,
किस राह को हम निकले
किस राह को चले गये ,
लिए किस तलाश को
बांधे किस आस को ,
किस तलब की प्यास है
जुस्तजू क्या कोई ख़ास है ,
बेखबर ख़ुद से होकर
बहका रहे चाह को ,
होश अपने खो बैठे
चढ़ा के खुमार को ,
गम अज़ीज़ हो गया
खुशी को नकार के ,
हार गये जब हम
उठा के नखरे बहार के ।

बुधवार, 10 जून 2009

स्वीकृति

पहले भी चुप रह कर समझे
अब भी चुप रह जायेंगे ,
तुम जैसा चाहोगे हमदम
वैसा साथ निभायेंगे ,
हर सितम सहते आए है
अब ये मुश्किल राह नही ,
ज़ख्म दवा बन जाती ही
जब कोई हो इलाज नही ,
चाहत में ये दस्तूर पुराना
है ये कोई नई बात नही ,
तुम कहना हम रहेंगे सुनते
होगी फिर कहाँ बात कोई ,
तुम जैसा चाहोगे हमदम
होगी हर बात वही ,

शनिवार, 6 जून 2009

याद जो इस अवसर पे अतीत से गुजर गई

'शाम से आँख में नमी सी है ,
आज फिर आप की कमी सी है '
तुम जहाँ भी हो हर वर्ष की तरह इस बार भी तुम्हारे साल गिरह की बधाई देने बैठी हूँ ,फर्क इतना है कि इस बार तुम्हे अपने ब्लॉग के जरिये मुबारकबाद दे रही हूँ ,अवसर तो खुशी का है मगर जुदाई के गम साथ लिए यादो की बौछारों से पलके भीग गई ,करोगे याद तो हर बात याद आएगी गुजरते वक्त की हर मौज ठहर जायेगी ,इस गुजरते वक्त में वो भी गुजर गया जहाँ हम सभी साथ थे ,और इस वक्त के झोखे में बिखर कर दुनिया की भीड़ में भटक गए ,पर उन यादो का क्या जो अभी तक जंजीर में जकड़ी है बस यही ठहर कर रह जाती है ,दूर नही होती ,उन्ही यादो को संजोये ये सफर चलता रहता है ,ऐसे ही कुछ अवसरों पे जब अतीत गहराई पकड़ने लगती है तभी कलम के सहारे उन बिछडे पलों का सफर तय होता है ,हर अहसास हर जज़्बात जो दिलो के दर से गुजरती है ,उसकी शुरुआत हमारे साथ से शुरू हुई और तभी महसूस किया इस दोस्ती भरे रिश्तों को ,प्रारंभ और अंत ,वही तक रहा ,जहाँ तक साथ उस रेगिस्तान में कितनी ठंडक थी ,जो अब हसीं वादियों में नही ,दिलो के हाल ,ख्याल पे मिलकर खूब लिखा सबने पर अब वो साथी नही जहाँ आपस में कुछ पढ़ा व पढाया जाए ,इसलिए जब ब्लॉग पे दूसरो की रचना पढ़ती हूँ और उनके ख्याल से जब टकराती हूँ तो अपनी रचना याद आ जाती है ,और उस वक्त कभी मुस्कुरा देती हूँ कभी गमगीन हो कर खो जाती हूँ ,सब कुछ छूट गया साथ के साथ ,अब तो आस नही ,तलाश नही सिर्फ़ एक ' काश ' है ,साँसों की अवधि में क्या होगा ये भी ख़बर नही ,हमलोग के बिछड़ने के साथ ही मैं लिखना बंद दी ,यु कहो माहौल भी नही मिला ,और नही ही किसी से दोस्ती किया ,ये भी कह सकते है मन की इजाजत नही रही ,पर अचानक कुछ वर्ष पहले दो नए दोस्त बने ,जिनकी जिद्द पर फिर लिखना शुरू हुआ उसी में एक ने ब्लॉग भी तैयार किया ,उसके स्नेह व फिक्र को देख मुझे अपनी दोस्ती याद आ गई ,साथ हमारा लंबा तो नही मगर समझ बहुत गहरी है ,इस लिए उसकी बात को मान देने के लिए उसकी बातें मान ली ,दोस्त को पैगाम दोस्त के दिखाए राह पे ही दे रही हूँ ,उसकी वज़ह से इस बर्ष डायरी से ब्लॉग पे उतर आया ,किसी से कुछ कही नही आज तक इसलिए ब्लॉग पे लिखने में संकोच करती रही फिर अपने दोस्त से सलाह ली और उसी ने कहा लिखो ,फिर साहस की क्योकि ये मेरे वश की बात नही ,क्योकि औरो से हाले दिल बयां किया नही न करना चाहती हूं इसलिए ब्लॉग पे वो रचना भी नही लिखती जिनमे जज्बातों का ज़िक्र हो जो हमारे खयालो को उजागर करे ,लिखना मुझे अपने लिए हीअच्छा लगता है ,बीते वक्त की तरह वह भी हमारे तक रुक कर रह गया ,पर सालगिरह पर इसलिए लिखी जिससे कभी तुम भी इसके संपर्क में आ सको ,शायद जुदाई से कटने के यही रास्ते है ,अतीत से दूर भागती हूं पर कभी भाग नही पाई आज के दिन तुम्हे पुरानी यादे , उससे जुड़ी कविता कुछ गानों के बोल भेट स्वरुप लिखकर तुम्हारे नाम कर रही हूं ,
दंश स्मृति के विषैले हो गए ,
रात के सपने सुबह तक खो गए ,
बादलो ने दी चुनौती आँख को
ज़िन्दगी के पृष्ठ गीले हो गए ,
शेष आकर्षण उजालो में नही
आचरण के ढंग मैले हो गए ,
बिजलियों के घात से सहमी हूं मैं
दृष्टि के विस्तार धुंधले हो गए ,
आचमन कर पी गई जीवन व्यथा
स्वाद सब सुख के कैषेले हो गए ,
आंसुओं से ब्याह कर ये क्या किया
गीत के स्वर छंद गीले हो गए ,
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दूसरी रचना आज के अवसर पे ----
सखी तुम्हारे साल गिरह पे
शब्दों भरा ये सौगात ,
तुम तो मेरे पास नही ,जो
कुछ और दे संकू आज ,
सखी तुम्हारे जन्मदिन पे
नम हो गई ये आँख ,
तुम तो मेरे साथ नही
पर पास है ढेरो याद ,
है जिंदा अब भी उन यादो में
सब खट्टे -मीठे अहसास ,
बर्षो बीत गए हमें बिछडे
अब संग है अपने काश ,
बदल चुके इतने बर्षो में
पहचान के भी लिबास ,
जाने तुम कहाँ खो गए
रह गई अधूरी हर बात ,
कहते दुनिया गोल है
शायद कभी टकराए ,
दिन के ढलने से पहले
कभी शाम रौशन हो जाए ,
जितना गहरा साथ रहा
हुई उतनी गहरी दूरी ,
भाग्य के आगे बेबस हुए
लिए हम अपनी मजबूरी ,
सर्द राहो में गर्म धुप का
मिल जाए जो आभास ,
भरकर आंखों में ऐसी उम्मीद
भेज रही ये सौगात ,
सखी तुम्हारे जन्मदिन पे
शब्दों भरा सौगात ,
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दिन कुछ ऐसे गुज़राता है कोई
जैसे अहसान उतराता है कोई ,
देर से गूंजते है सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई ,
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वो तुम न थे ,वो हम न थे ,वो रहगुज़र थी प्यार की ,
लूटी जहाँ बेवज़ह पालकी बहार की ,
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हाथ छूटे भी तो रिश्ते नही छोडा करते ,
वक्त के शाख से लम्हे नही तोडा करते ,
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तुम न जाने किस जहाँ में खो गए ,
हम भरी दुनिया में तनहा रह गए ,

सोमवार, 1 जून 2009

पहली बारिश

पहली बारिश की बूंदा -बांदी
रिमझिम -रिमझिम पानी की झड़ी ,
लिए पल -पल की आस
तपता मन रहा ,करता इंतज़ार ,
रिमझिम बारिश की ये शुरुआत
जगा गई ज्यो जीने की आस ,
प्रकृति ,पशु -पक्षी ,जन -जन ने
ली हो ज्यो राहत की साँस ,
खुशियों की सौगात लेकर
जैसे आई हो बरसात ,
बूंदा -बांदी की इस ठंडी रुत में
छमाछम करने बच्चे भी भागे ,
हो दुनिया की सभी शै फीकी
जैसे इस जीवन अमृत के आगे ,
खेत -खलिहानों में भी जागी
हरियाली की उमंग ,
शीतल जल की फुआर से
भर गया जब हर आँगन ,
पहली बारिश की झड़ी
आई ले खुशियों की घड़ी