सोमवार, 29 जून 2009

शिकवा

उम्र गुज़र जाती है सबकी
लिए एक ही बात ,
सबको देते जाते है हम
आँचल भर सौगात ,
फिर भी खाली होता है
क्यो अपने में आज ?
रिक्त रहा जीवन का पन्ना
जाने क्या है राज ?
रहस्य भरा कैसा अद्भुत
होता है , क्यो अहसास ?
रोमांचक किस्से सा अनुभव
इस लेन-देन के साथ ,
गिले -शिकवे की अपूर्णता पे ,
घिरा रहा मन हर बार ।

15 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सत्य लिखा है........... जीवन का कडुवा सच........... अक्सर आँचल रिक्त हो जाता है........ पता ही नहीं चलता समय की दौड़ में

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

jyoti ji

aapki is kavita me abhivyakt bhaavnaaye sacchi hai .. aap bahut accha likhti hai .. yun hi likhte rahe ..

namaskar.

ज्योति सिंह ने कहा…

नासवा जी और विजय जी शुक्रिया ,विजय जी बहुत दिनों में नज़र आये ,आये तो सही

शोभना चौरे ने कहा…

bhut acha likhti hai aap .ak imandar rchna
badhai

ज्योति सिंह ने कहा…

शोभना जी आप आई अच्छा लगा ,शुक्रिया

Kishore Choudhary ने कहा…

कविता के कुछ शब्द दिमाग में घूम रहे थे मेरी व्यस्तता के बीच...
बधाई

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

बहुत सुन्दर भावः पूर्ण सृजन
मेरे ब्लॉग पर पधार कर ग़ज़लों का आनद लें
प्रदीप मनोरिया
09425132060

sandhyagupta ने कहा…

Bhavpurn aur sundar abhivyakti.Badhai

डा०आशुतोष शुक्ल ने कहा…

Saugat men bhi khali pan ka ehsaas karna achchha hai....

pukhraaj ने कहा…

आपका शिकवा जायज है ....सबको अंचल भर सौगात देके
हमारा मन खली खली क्यूँ रह जाता है

ज्योति सिंह ने कहा…

सभी सराहने वालो को तहे दिल से शुक्रिया .यह एक अटूट सच्चाई है जिसके हिसाब लगाते हुए हमे हल कभी नहीं मिलता .और अंत में हारकर इस जोड़ -घटाव में जोड़ हमारे हिस्से में होता है .

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....

ज्योति सिंह ने कहा…

मेरा सौभाग्य जो आपने इस रचना को पसंद किया .प्रसन जी .

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} ने कहा…

श्री प्रसन्न वदन चतुर्वेदी के ब्लॉग पर '' हर रोज कुआँ खोदना '' पढ़ा पूर्व की रचनाएं भी पढ़ी देखा कि इधर उनका स्वर अत्याधिक निराशावादी लगा जब कि पुरानी रचनाओं में वे एक समर्थ गीतकार एवं कवि लगे ,मुझे लगा कि एक सक्षम और समर्थ गीतकार एवं कवि अपने को व्यर्थ कर रहा है अतः मुझे उन्हें टोकना पड़ा , क्यूँ कि उनकी रचनाएँ मुझे अच्छी लगी थीं | उस समय तो टिप्पणी दे कर कर चला आया बाद में लगा कि मैं ज्यादा कठोर हो गया था ,लाख मैंने उन्हें एक सक्षम और समर्थ कवि कह कर उनकी प्रशंसा ही क्यूँ न कि हो ; अतः पुनः उनके ब्लॉग पर अपने शब्दों के लिए [ उनके प्रति अपने विचारों और उनके आकलन के लिए नही ] खेद प्रकट कर लूँ नही तो सो नही पाउँगा कि जो कबीरा पर आकार मेरी रचनाओं की प्रशंसा कर के गया हो उसके साथ मेरा ऐसा व्यवहार गलत है ,मुझे किसी की भावनाओं को आहत करने का कोई अधिकार नहीं है |
जब मैं इसी उद्देश्य से उनकी उस पोस्ट पर पुनः पहुंचा तो मैंने आप की टिप्पणी देखी जिसमें अपने भी यही बात बड़े सुन्दर और सीमित शब्दों में कही थी , अच्छा लगा शैली अच्छी लगी और इसी कारण से इस समय यहाँ हूँ | मेंरी कमी या शैली इसी से आप को पता चल ही गयी होगी इतना विवरण मात्र इस को बताने के लिए दे डाला कि मै आप के ब्लॉग पर कैसे पहुंचा |
वास्तव में यही आप की शैली की विशेषता थी जो मुझे यहाँ खींच लायी और यहाँ आकार आप की सुन्दर रचनाएँ पढ़ कर मेरा अनुमान सही ही निकला
अपने भी शिकवा किया है परन्तु इसमें एक रहस्य-भेद का भावः भरा है आप ने एक प्रश्न उठाया है उसके उत्तर की दरकार है, मेंरी समझ में इस में वही बात आप कह रही है , जो मैंने ''सफ़र के बीच '' में कही है


जरा सोचिये भी सफ़र में ,

क्या -क्या ले निकले थे,

उम्र के इस छोर आने तक ,

क्या खोया क्या पाया ,

इन्सानी रिश्तों को कौन

सहेज सका , कितना इनको,

मैं खुद भी जी पाया ,

ज्योति सिंह ने कहा…

जहाँ ,जिससे उम्मीद नहीं होती वही से हमें बहुत कुछ मिल जाता आपके आने से भी कुछ ऐसा ही माहौल बना और बेहद प्रसन्नता भी हुई .अहसास बाटने से बोझ हलके होते है ,मुझे अच्छा लगा .आपकी बाते मेरी कविता से ज्यादा प्रभावशाली रही .आते रहिये यु ही .