मंगलवार, 23 जून 2009

असंभव कल्पना

पानी पर लकीर खींच रही हूँ ,
बात बनने की तसल्ली लिए
ना समझ बन रही हूँ ,
जल की धाराओ में
रास्ता देख रही हूँ ,
नादान बनकर लहरों पे
स्वप्न बुन रही हूँ ,
आपे से बाहर होकर
तारे तोड़ने की कोशिश आसमान से ,
इस तरह हर असंभव कल्पना को
साकार कर रही हूँ ।

9 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

कल्पना करने वाले ही तारे तोड़ लाते है
aapki kalpana shakti ko salam

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अगर कल्पना न हो तो जीवन ही नहीं............. लाजवाब लिखा है आपने

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

दिल में हौसला हो तो तारे भी तोड ही लेंगे हम..शानदार.

cartoonist anurag ने कहा…

pani par lakeer........
bahut hi sunder rachna hai.......
badhai.........

ज्योति सिंह ने कहा…

आप सभी लोगो का तहे दिल से शुक्रिया जो आकर हौसला बढाया .

SWAPN ने कहा…

khoobsurat abhivyakti.

ज्योति सिंह ने कहा…

मैं जब ये कविता लिख रही थी तो सोंच ही रही थी कि आपकी इस पर टिप्पणी अवश्य आएगी इस सच पर मुस्कुरा उठी ,शुक्रिया .स्वपन जी .

Suman ने कहा…

nice

डा०आशुतोष शुक्ल ने कहा…

jab asambhav ko sambhav karne ke hausle honge tabhi to sapne sach hongen...