जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
Aabhar .
मनुष्य आचरण जन्म से
कदापि , होता नही कुरूप ,
ढलता जिस साँचे में
बनता उसका प्रतिरूप ।
सच्चाई को सुंदर शब्द दे दिए आप ने
बधाई !
कदापि , होता नही कुरूप ,
ढलता जिस साँचे में
बनता उसका प्रतिरूप ।
बिलकुल सही बात कही। सुन्दर सब्देश देती रचना के लिये बधाई।
ek sarthak arth wali kavita....!
बुरा या भला नहीं होता उसे तो साथ परिस्थितियां और मजबूरियां ही सब कुछ बनाती हैं
कदापि , होता नही कुरूप ,
ढलता जिस साँचे में
बनता उसका प्रतिरूप
क्या बात कही है ज्योतिजी आपने \सोलह आने सच |
उपमा अलंकार का अच्छा प्रयोग किया है |
सुन्दर कविता |
सत्संगति कथय किं न करोति पुंसाम् ।
भर्तृहरि
आपकी रचना प्रकृति की जय बोलती है । आपकी कविताएँ समाज का पथ प्रशस्त करेंगी ।
कदापि , होता नही कुरूप ,
ढलता जिस साँचे में
बनता उसका प्रतिरूप ।
-बहुत ही सच्ची बात कही आप ने.संगत का असर ही ऐसा है.
-गहन भाव लिए यह बहुत अच्छी कविता है.