सोमवार, 10 जनवरी 2011

आधुनिकता ........


आधुनिकता परिधानों में नही
आधुनिकता दिखावे में नही ,
आधुनिकता झलकती है
अपने विचारो से ,
आधुनिकता दिखती है
अपने व्यवहारों में ,
आधुनिकता सुसंस्कार में
आधुनिकता पावन प्यार में
अश्लीलता से सर झुकता है
अभद्रता से रिश्ता टूटता है ,
रेशमी परदे से हालात ढकते नही
कर्जो पर शान -शौकत टिकते नही ,
शालीनता में रहकर शिष्टता निभाये
अपनी सुसंस्कृति को आगे बढ़ाये ,
धर्म के नाम पर झंडे लगाये
जाति -पाति पर सवाल उठाये
जहाँ भूख बिलखती है
दो रोटी के आस में ,
पेट को वो ढकती है
अपने दोनों पाँव से ,
लाचार खड़ा होता है
आदमी जहाँ इलाज में ,
घर छीन लिया जाता
जहाँ वृद्धों के हाथ से ,
भेदभाव पनपते है यहाँ
अमीरी -गरीबी से ,
इमानदारी खरीद ली जाती
नोटों की गड्डी से
हालात जिस देश के हो इतने गरीब
बेचकर इंसानियत और जमीर ,
हम कैसे कह सकते है कि
हम है यहाँ आधुनिक

27 टिप्‍पणियां:

रचना दीक्षित ने कहा…

ज्योति जी,
आजके समाज का यथार्थ चित्रण किया है आपने. दिखावा एक अभिन्न अंग हो गया है जीवन का. बहुत सुंदर.

हालात जिस देश के हो इतने गरीब
बेचकर इंसानियत और जमीर ,
हम कैसे कह सकते है कि
हम है यहाँ आधुनिक ।

बधाई स्वीकार करें.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कहा आपने, विचार आधुनिक हों, उन्नत हों, परिमार्जित हों। चो पूर्वजों के सोने और आधुनिकता के पीतल में भी भेद न कर सके, वह कैसा उन्नत?

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

आधुनिकता परिधानों में नही
आधुनिकता दिखावे में नही ,
आधुनिकता झलकती है
अपने विचारो से ,
आधुनिकता दिखती है
अपने व्यवहारों में ,
आधुनिकता सुसंस्कार में
आधुनिकता पावन प्यार में

kyaa baat hai !
jyoti ji ,bahut sundar kavita hai,jeevan ke kai pahluon ko chhoo liyaa aap ne,bahut sundarta se sachchaaee kaa varnan kiya hai
badhaai

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय ज्योति सिंह जी
नमस्कार !
रचना का अनूठा और बिम्बात्मक अन्दाज लाजवाब

मनोज भारती ने कहा…

वास्तव में ही यही सची मानवता और आधुनिकता है ।

daanish ने कहा…

aaj ke is "aadhunik maanav" par
bahut hi spasht`taa se
bahut steek aur arth-poorn shabdoN meiN kriti rachee hai aapne ...
kaash....
hm ab bhi sambhal paaeiN to...
a b h i v a a d a n .

Mithilesh dubey ने कहा…

सच कहा आपने, विचार आधुनिक हों, उन्नत हों, परिमार्जित हों।

nilesh mathur ने कहा…

बहुत सुन्दर!

राज भाटिय़ा ने कहा…

ज्योति जी, बहुत ही सुंदर ओर सधे शव्दो मे आप ने आज की बात कह दी....
हालात जिस देश के हो इतने गरीब
बेचकर इंसानियत और जमीर ,
हम कैसे कह सकते है कि
हम है यहाँ आधुनिक ।
बहुत सुंदर, धन्यवाद

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

अश्लीलता से सर झुकता है
अभद्रता से रिश्ता टूटता है ,
रेशमी परदे से हालात ढकते नही
कर्जो पर शान -शौकत टिकते नही ,
शालीनता में रहकर शिष्टता निभाये
अपनी सुसंस्कृति को आगे बढ़ाये ,
धर्म के नाम पर झंडे न लगाये
जाति -पाति पर सवाल न उठाये ।

itni pyari baat...wo bhi sadhe hue sabdo me...bahut bahut abhaar...mann khush ho gaya..:)

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आधुनिकता के नाम पर हम अपनी संस्कृति और सभ्यता भूल जाते हैं , आधुनिकता का नाम अपने विचारों को उन्नत बनाने से है. मन की संवेदनाओं का परित्याग नहीं है. इसको आडम्बर की चादर से ढककर ग्राह्य नहीं बना सकते हैं. बहुत अच्छी तस्वीर पेश की है आज के परिप्रेक्ष्य में.

M VERMA ने कहा…

आधुनिकता को सही रेखांकित किया है आपने

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

शालीनता में रहकर शिष्टता निभाये
अपनी सुसंस्कृति को आगे बढ़ाये...
वाह...क्या बात है ज्योति जी,
इस उम्दा लेखन के लिए बधाई स्वीकार कीजिए.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है ज्योति. लिखती रहो इसी तरह.

वाणी गीत ने कहा…

आधुनिकता हमारे विचारों में होनी चाहिए ...
मूल बात यही है ...मगर हम एक दूसरे की नक़ल करते वास्तविक अर्थ भूलने लगते हैं ...
अच्छी कविता ...सार्थक सन्देश !

H P SHARMA ने कहा…

bahut badhiyaa likhaa hai jyoti ji

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

ज्योति सिंह जी,
आपने सही कहा ,आज आधुनिकता की परिभाषा बदल गयी है !
उपरी दिखावे को ही हम आधुनिकता की पहचान मान बैठे हैं !
आपकी कविता अंतर्मन की संवेदना से प्रस्फुटित हुई है !
सुन्दर अभिव्यक्ति !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

सतीश सक्सेना ने कहा…

अच्छा लिख रही हो ....शुभकामनायें !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

ढोंगी आधुनिकता की आपने अच्‍छे से परतें उधेडी हैं। बधाई।

---------
बोलने वाले पत्‍थर।
सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

shikha kaushik ने कहा…

vastvikta ko shabdon ke madhayam se bakhoobi kavita ke roop me prastut kiya hai aapne .badhai.
mere blog ''vikhyat' par aapka hardik swagat hai .

sagebob ने कहा…

बहुत अच्छी कविता.आधुनिकता सिर्फ फास्ट फ़ूड या आधुनिक परिधानों में नहीं है.आधुनिकता दकिआनूसी रस्मों, रिवाजों और
विचारों को उतार फेंकने का नाम है.आपकी कलम को साधूवाद .

Rajesh Kumar 'Nachiketa' ने कहा…

आप से पूरी तरह सहमत. अजीब सी चीज़ को लोग आधुनिक्ला समझ बैठे हैं...
आधुनिकता का सही चित्रण किया आपने.....
अच्छा लगा पढ़कर....

Arvind Mishra ने कहा…

सही चोट करती कविता -

Dr.Ajeet ने कहा…

ज्योति जी,

बहुत दिनों से आपका शेष फिर पर आना नही हुआ है यह बात मुझे अभी पता चली जब मै अपने कुछ पुराने कमेंट्स पढकर ऊर्जा बटोर रहा था आप मेरी कमअक्ली और काहिली के बाद भी अपने बडप्पन के साथ शेष फिर अपने कमेट्स प्रेषित करती रहती थी।

कुछ व्यस्तता है या मेरे निठल्ले चिंतन से अरुचि हो गई है।
आपका आना एक उपलब्धि है, उम्मीद करता हूँ कि ये सिलसिला फिर से चल पडेगा।

सादर
डा.अजीत
www.shesh-fir.blogspot.com
www.meajeet.blogspot.com

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

सार्थक रचना।


और हां, क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

सतीश सक्सेना ने कहा…


फोटोग्राफर को मेरी बधाई दीजिये ! बेहतरीन फोटो है यह ....

Dinesh pareek ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और रोचक लगी | आपकी हर पोस्ट
आप मेरे ब्लॉग पे भी आये |
मैं अपने ब्लॉग का लिंक दे रहा हु
http://vangaydinesh.blogspot.com/