आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है कल (28-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
Wah! Kitni nafasat se tanhaai kaa aalam pesh kiya hai! Kharab tabiyat ke karan 2/4 din net pe nahee aa saki,isliye der se tippanee de rahi hun! Kshama chahti hun.
तनहाई में वैसे ऐसा कम ही होता है कि पता ही नहीं चलता कब रात गई कब सुबह हुई वर्ना होता तो इसके उलट ही है । आसुओं व्दारा हमेशा ही साथ निभाया जाता है। नींद भरी आखें ओर करवट का तालमेल भी ठीक रहा । दराजे तनहाई , दार मदार, दर्क उर्दू कुछ ज्यादा ही होगई। हालंाकि दर्क का अर्थ भी लिख दिया गया है। शीर्षक भी अच्छा दिया है।
"और जागते को सुबह भी जगाने आई " ये क्या कह दिया ज्योति जी आपने. तन्हाई के आलम का ऐसा बयां कि सुबह की चेष्टा भी ओपचारिकतामात्र ही रह गयी .आपकी काव्यांजलि का बहुत बहुत आभार .
बात अपनी होती है तब जीने की उम्मीद को रास्ते देने की सोचते है वो , बात जहाँ औरो के जीने की होती है , वहाँ उनकी उम्मीद को सूली पर लटका बड़े ही आहिस्ते -आहिस्ते कील ठोकते हुये दम घोटने पर मजबूर करते है । रास्ते के रोड़े , हटाने की जगह बिखेरते क्यों रहते हैं ? ........................................ इसका शीर्षक कुछ और है मगर यहाँ मैं बदल दी हूँ क्योंकि यह एक सन्देश है उनके लिए जो किसी भी अच्छे कार्य में सहयोग देने की जगह रोक -टोक करना ज्यादा पसंद करते .
कितने सुलझे फिर भी उलझे , जीवन के पन्नो में शब्दों जैसे बिखरे । जोड़ रहे जज्बातों को तोड़ रहे संवेदनाएं , अपनी कथा का सार हम ही नही खोज पाये । पहले पृष्ठ की भूमिका में बंधे हुए है , अब भी , अंत का हल लिए हुए आधे में है अटके । और तलाश में भटक रहे अंत भला हो जाये , लगे हुए पुरजोर प्रयत्न में यह कथा मोड़ पे लाये ।
एकांत का संसार स्मृतियों में डूबा...भला, बुरा सोचता प्रश्नों से जूझता...हलों को ढूंढ़ता कल को खोजता...आज में जीता आस को जगाता...बिश्वास को सूली पे लटका हुआ कभी पाता टूटता, बिखरता...अंतर्मन के द्वन्द लिए जीतता तो कभी हारता दुख में उदास होकर...रोता बिलखता सुख का ध्यान कर...हँसता मुस्कुराता भविष्य की चिंता करता कभी परिस्थितियों पे...विचार करता थोड़ा सामने जाता...फिर पीछे हट जाता अकेले रहने पर मनुष्य.. स्वाभाविक रूप से विचारों में उलझा रहता हैं मौन व्रत धारण किए कई किस्से गढ़ता हैं, स्वतंत्र रूप से जीता.... वो अपनी जिस दुनिया में वही हैं.....उसका अपना संसार एकांत का संसार जो देता हैं जीवन को विस्तार... ज्योति सिंह 🙏🙏
टिप्पणियाँ
नमस्कार !
बहुत अच्छी लगी आपकी रचना ।
आपकी कलम को सलाम
प्रणाम.
सुबह भी जगाने आई ।
क्या बात है तन्हाई का आलमे बयां. बहुत बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिए.
क्या खूब तन्हाई के आलम का बयां किया है.
सलाम
सुबह भी जगाने आ गई...
वाह...नयापन है कलाम में
बधाई स्वीकार करें ज्योति जी.
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (28-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
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Kharab tabiyat ke karan 2/4 din net pe nahee aa saki,isliye der se tippanee de rahi hun! Kshama chahti hun.
और जागते को सुबह भी जगाने आई ...
तन्हाई का बेहतरीन चित्रण । बहुत अच्छी रचना !
ये क्या कह दिया ज्योति जी आपने.
तन्हाई के आलम का ऐसा बयां कि सुबह की
चेष्टा भी ओपचारिकतामात्र ही रह गयी .आपकी काव्यांजलि का बहुत बहुत आभार .
और जागते को
सुबह भी जगाने आई
कमाल
सही कहा है आपने ! शुभकामनायें आपको !!