कितने सुलझे फिर भी उलझे , जीवन के पन्नो में शब्दों जैसे बिखरे । जोड़ रहे जज्बातों को तोड़ रहे संवेदनाएं , अपनी कथा का सार हम ही नही खोज पाये । पहले पृष्ठ की भूमिका में बंधे हुए है , अब भी , अंत का हल लिए हुए आधे में है अटके । और तलाश में भटक रहे अंत भला हो जाये , लगे हुए पुरजोर प्रयत्न में यह कथा मोड़ पे लाये ।
टिप्पणियाँ
आपकी लिखी रचना आज शनिवार 20 मार्च 2021 को शाम 5 बजे साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन " पर आप भी सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद! ,
ज़िक्र हम तूफानों का
बस तुम स्वागत करो
आकांक्षाओं की वधु का
नावों को भी मोड़ दे देंगे
हवाओं के रुख का
साहिल पर भी बाँध देंगे
तुम्हारी उमंग भरी नाव को
हर तम को भगा बस
रोशन करेंगे ज्योति को ..
बहुत सकारात्मक रचना ... अच्छा लगा पढना और भावनाओं से जूझना भी :) :)
ऐसा मैंने कुछ नहीं किया , बस पढ़ते हुए जो भी मन में भाव उठते हैं यूँ ही लिख देती हूँ । आपका तो पुराना साथ है । किस्मत में होगा तो ज़रूर मुलाकात होगी । स्नेह
सुंदर मनोभाव।