बुधवार, 2 सितंबर 2009

खामोशी

खड़ी खड़ी मैं देख रही,

मीलों की खामोशी,

नहीं रही अब इस शहर में,

पहली सी हलचल सी।

खामोशी का अफसाना क्यों ,

ये वक्त लगा है लिखने,

जख्मों से हरा-भरा

ये शहर लगा है दिखने।

देकर कोई आवाज़ कहीं से

ये तोड़ो लम्बी खामोशी।

बेहतर लगती नहीं कहीं

गलियों में फिरती खामोशी।

15 टिप्‍पणियां:

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

ज्योति जी,
'खामोशी का अफसाना क्यों
ये वक़्त लगा है लिखने,
ज़ख्मों से हरा-भरा
ये शहर लगा है दिखने !'
सुन्दर भावाभिव्यक्ति ! अल्फाज़ सलीके से आये हैं और मर्म को छूते हैं... बधाई !

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

पहली सी हलचल सी। isme last सी hata deziye plz kavita ki lay ban jayegee .........or
ये वक्त लगा है लिखने isme ,zara
में jod de to baat ban jaayeबाकि हम तो कब से तरस गयी आपको पढने ,.............

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

aapki abhvyakti ko pranam! abhi bahar hun ............aaram se padhuga .........

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut khoob jyoti, sunder rachna.

Poonam Agrawal ने कहा…

Aaj her jagah itni halchal hai ki agar aap khamoshi chahe to milna mushkil hai .....aise main aapko galiyon mein khamoshi mil jati hai .....ya ye mann ki khamoshi hai jo kavita ke roop mein jhalakti hai ...jo bhi hai sunder abhivyakti hai....
Regards.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

VAH ....... AAPNE TO KHAAMOSHI KO BHI EK AFSAANA BANAA KAR PRASTUT KAR DIYA ... LAJAWAAB LIKHA HAI

ये वक्त लगा है लिखने,
जख्मों से हरा-भरा
ये शहर लगा है दिखने।

IS SHAHER KE JAKM SE HI TO NIKAL RHI HAI KHAAMOSHI ... UMDAA RACHNA HAI ...

vikram7 ने कहा…

देकर कोई आवाज़ कहीं से

ये तोड़ो लम्बी खामोशी।

बेहतर लगती नहीं कहीं

गलियों में फिरती खामोशी।
अति सुन्दर भावाभिव्यक्ति

शरद कोकास ने कहा…

यहाँ खामोशी के अनेक ध्वन्यार्थ हैं इन्हे साफ सुना जा सकता है \ बधाई -शरद कोकास दुर्ग छ.ग.

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

'खामोशी का अफसाना क्यों
ये वक़्त लगा है लिखने,
ज़ख्मों से हरा-भरा
ये शहर लगा है दिखने !'

बेहतरीन पंक्तियाँ.

हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

Kishore Choudhary ने कहा…

किसी का मत सुनिए
आप तो कमाल लिखती हैं वाह वाह वाह !!!

Babli ने कहा…

वाह बहुत खूब! आपकी रचनाओं की तारीफ जितनी भी की जाए कम है!

sandhyagupta ने कहा…

Khamoshi ki bhi apni awaz hoti hai.

Bahut pasand aayi aapki yah rachna.

kshama ने कहा…

Baar,baar aahee jatee hun, aapkaa likha padhne....gehrayee itnee hotee hai,ki, har baar kuchh puranee rachna me naya arth milta hai...saral, sahaj hote hue bhee..!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत दिन बाद इंटरनेट पर बैठ पाया ,पहले पत्र देखे याहू पर फिर ब्लॉग देखना शुरू कियाअपने पराये पर पोस्ट २२ अगस्त की थी ,और काव्यांजलि पर भी पुरानी २ सितम्बर की लेकिन मेरे लिया नई
आपकी यह रचना पढ़ कर मुझे ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा हादसा हुआ हो और शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया होक्योंकि इसमें "मीलों ""खामोशी शब्द प्रयुक्त हुआ है ,एक शब्द और प्रयोग किया है आपने "जख्मों से भरा ""जिससे मेरे सोच को बल मिलागलियों में खामोशी अच्छी नहीं लगती इसे तोड़ो इससे भी ऐसा लगा जैसे कर्फ्यू लगे ज्यादा दिन हो गए हों और यदि अन्य द्रष्टिकोण से रचना लिखी है तो वह इस बात का द्योतक है कि व्यक्ति अकेले में डरता है क्योंकि अकेले में स्वम से सामना होता है ,वह हम करना नहीं चाहते ,रेडियो खोल लेंगे ,टीवी ऑन कर देंगे सोचते है कोई आजाये बच्चा ही सही उससे बातें करने लगेंगे ,अखवार उठा लेंगे पत्रिका पढने लगेंगे कभी कभी ऐसा भी होता है कि अपने ही घर में बुरा बुरा सा लगने लगता है ,इतना बुरा जैसे कोई बड़ी दुर्घटना घटित हो गई हो | खामोशी सब तोड़ना चाहते है बस जश्न हो ++जश्ने शादी न सही जश्ने मैयत ही सही |
कुल मिला कर रचना बहुत उत्तम बन गई है ,वधाई

ज्योति सिंह ने कहा…

सबसे पहले मैं तहे दिल से आप सभी साथियों का शुक्रिया अदा करती हूँ जो मेरे एक महीने बाहर रहने के बाद भी मेरे ब्लॉग से बराबर जुड़े रहे और साथ ही उस दोस्त का भी जिसने मेरी गैर हाजरी में भी मेरी रचना ब्लॉग पे लिखकर ब्लॉग को सूना न रहने दिया .ऐसे दोस्तों की दुनिया को सलाम .अब धीरे धीरे सबके ब्लॉग पर आ रही हूँ .यह इंतज़ार मेरे लिए भी लम्बा रहा और आप सभी की फ़िक्र भी रही .एक बार फिर शुक्रियां .