सोमवार, 7 दिसंबर 2009

विरक्ति

थक गई ,हर वक्त

रिश्तें को बचाते -बचाते

और अनेको बार

हो गई घायल ,

इसकी हिफाजत में

लड़ते - लड़ते

जीत पाने की तमन्ना

हर मोड़ पर हराती गई ,

चक्की में घूमा -घूमा

हालात को पीसती गई ,

विरक्त हुआ मन

सब छोड़ चले ,

हर किसी को यहाँ

अपने हाल पे रहने दे

12 टिप्‍पणियां:

रचना दीक्षित ने कहा…

विरक्त हुआ मन
आ सब छोड़ चले ,
हर किसी को यहाँ
अपने हाल पे रहने दे।

ज्योति जी अक्षर शः सत्य है ये बात । आज के परिपेक्ष्य में जितना लोगों को उनके हाल पे छोड़ देंगे उतना ही आप तनाव मुक्त होंगे । पर इस पर अमल करने में वक्त लग सकता है

रश्मि प्रभा... ने कहा…

रिश्तों को बनाये रखने के उपक्रम में आदमी अकेला रह जाता है

kshama ने कहा…

Shayad ham sabhika man rishtonkee hifazat karte,karte ghayal ho jata hai!Aapki bhasha behad saral seedhee hai, isliye baar baar padhne kaa man hota hai!

शोभना चौरे ने कहा…

अपने लोगो में सामंजस्य बिठाते बिठाते हम उलझ जाते है |
बहुत ही सुन्दरता और सरलता से अपने मन के भावो को उकेर दिया है |
आभार

BrijmohanShrivastava ने कहा…

रिश्तों को बचाते बचाते थक जाना ,रक्षा मे लडते हुए घायल हो जाना .,जीतने की हसरत मे हारते चले जाना ,हालात को पीसते रहने पर भी कुछ हासिल न होना ।अन्तत:मन विरक्त हो ही जाता है ,और फिर यही दिमाग मे आताहै कि सब कुछ छोडा जाये ,जिसको जैसे जीना हो वैसे जिये ,और हकीकत मे जीवन की सच्चाई भी यही है ।उत्तम रचना

Apanatva ने कहा…

manobhavo par rishto ko nibhane ka asar dalatee kavita .
sunder rachana .

मनोज कुमार ने कहा…

कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

आ सब छोड़ चले ,
हर किसी को यहाँ
अपने हाल पे रहने दे

bahut khoob n SHUKRIYA BHEE MITR !!

Babli ने कहा…

लाजवाब पंक्तियाँ !बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! दिल को छू गई आपकी ये रचना! सही में हम रिश्तों को निभाते निभाते थक जाते हैं और अक्सर तन्हा रह जाते हैं!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा ...... कभी कभी इंसान तक जाता है, पस्त हो जाता है रिश्तों को निभाते निभाते ........ दिल से लिखा है अपने .........

अर्कजेश ने कहा…

बिल्‍कुल सत्‍य है ।

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......