मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

मन

अथाह सागर में उफनता

अशांत लहरों सा ये मन मेरा

जीवन की इन उलझनों को

सुलझाता हुआ ये मन मेरा

इस उधेड़ -बुन के जाल में

फंस कर रह गया ये मन मेरा

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नींव की पुनरावृति कर

खंडहर क्यो बुलंद करते हो ?

जर्जर हो गये जो ख्याल

उनमे हौसला कहाँ जड़ पाओगे

अतीत को वर्तमान सा बनाओ

टूटे मन को कहाँ जोड़ पाओगे


16 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

phir ekbaar atev sundar rachana!
Har rachna achhee hoti hai aapki! Kamaal hai!

ज्योति सिंह ने कहा…

shukriyaa kshama ji ,itni taarif kar di ki aankhe nam ho gayi ,ye aapka badppan hai jiski main ahsaanmand hoon .

अर्कजेश ने कहा…

बहुत गहरे भाव लिए हुए ।

मनोज कुमार ने कहा…

रचना अच्छी लगी ।

रचना दीक्षित ने कहा…

नींव की पुनरावृति कर
खंडहर क्यो बुलंद करते हो ?
जर्जर हो गये जो ख्याल
उनमे हौसला कहाँ जड़ पाओगे ।
अतीत को वर्तमान सा न बनाओ
टूटे मन को कहाँ जोड़ पाओगे ।
अतीत की गांठे मजबूत होती जाती हैं उन्हें जितना खोलो वो उतना ही कस कर हमें अपने से और ज्यादा जोड़ने लगती हैं हमेशा की तरह एक अच्छी रचना

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

man ki paribhasha..
man hi to vichitra hota he ji, aour sachmuch fansaa hi rahta he..
bahut achhe shabdo me aapne apani rachna kaa aadhar banayaa he.

Apanatva ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Apanatva ने कहा…

itana dard samete hotee hai aapakee rachanae mera man bheego jatee hai. ek ati sunder rachana .
par mujhe behad intzar hai ek khushnuma ehsas kee kavita ka .dero shubh kamnao ke sath aapakee blogger friend.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

सही है नींव जो पुरानी हो गई है जरा जीर्ण भी हो गई है उस पर इमारतों को बुलंद किये जारहे है लोग ।एक ओर चांद पर पहुंचने की बात है तो दूसरी ओर लोग बैलगाडी को ही ढोये चले जा रहे है ,समय के साथ बदलाव ज़रूरी है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

नींव की पुनरावृति कर
खंडहर क्यो बुलंद करते हो ?
जर्जर हो गये जो ख्याल
उनमे हौसला कहाँ जड़ पाओगे ।
अतीत को वर्तमान सा न बनाओ
टूटे मन को कहाँ जोड़ पाओगे ....

बहुत ही कमाल की रचना .... नयी सोच से उभरी लाजवाब रचना है .......

shama ने कहा…

Aapko aaj to shukriya kahne aayee hun...itne saare blogs padhe aur itnee sundar tippaniyan dee!

Maa pe yaad karaya geet bhi behad sundar hai!

shama ने कहा…

अतीत को वर्तमान सा न बनाओ
टूटे मन को कहाँ जोड़ पाओगे

अथाह सागर में उफनता
अशांत लहरों सा ये मन मेरा ।

Man waaqayi me aisahee hota hai..!Dono rachnayen bahut khoob!

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

अल्पना वर्मा ने कहा…

नींव की पुनरावृति कर
खंडहर क्यो बुलंद करते हो ?
जर्जर हो गये जो ख्याल
उनमे हौसला कहाँ जड़ पाओगे ।...

वाह वाह ज्योति जी क्या बात लिखी है!
बहुत सुंदर कविता.

[haan माफी चाहूँगी..मैं आप को समय से आप की शादी की सालगिरह की बधाई नहीं दे पाई,अभी आप को बहुत सारी बधाईयाँ और शुभ कामनाएँ प्रेषित करती हूँ,कृपया स्वीकार करें.
ईश्वर आप दोनो को हमेशा स्वस्थ और खुश रखे.]

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत गहरे भाव लिए हुए ।

Krishna Kumar Mishra ने कहा…

सुन्दर रचना