सोमवार, 4 जनवरी 2010

एक सा


कल जिस तरह आरम्भ हुई थी ,


आज तक वैसी ही बनी रही ।


प्रसून वेदना मानस पटल पर


यू अटल छवि सी अंकित रही ।


वर्तमान - भविष्य के मध्य अतीत का


आरम्भ भी वही और अंत भी वही ।

20 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

वर्तमान - भविष्य के मध्य अतीत का

आरम्भ भी वही और अंत भी वही ।
बहुत ही सुंदर भाव लिये.
धन्यवाद

Apanatva ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Apanatva ने कहा…

intzar us din ka jis din aapakee rachana vedana ke bhav se hee pare ho .
nav varsh aapake vartmaan ko khushiyon se bhar de isee aasheesh ke sath

मनोज कुमार ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने।

संजय भास्कर ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने।

संजय भास्कर ने कहा…

भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
सुंदर रचना....

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Suman ने कहा…

वर्तमान - भविष्य के मध्य अतीत का

आरम्भ भी वही और अंत भी वही ।nice

शोभना चौरे ने कहा…

poori kvita bahut hi sundar

कमलेश वर्मा ने कहा…

अच्छी लेखन शैली की प्रतीक हैं ...

ज्योति सिंह ने कहा…

ye purani rachna hai ,jo dalni thi uski taiyaari nahi rahi ,is karan ise dala ,magar aap sabhi ki tippani ne hausala badha diya ise pasand karke ,shukriyaan

संजय भास्कर ने कहा…

ARE MUMMY KAISI HAI...
AAPKA BETA
SANJAY BHASKAR

संजय भास्कर ने कहा…

कल जिस तरह आरम्भ हुई थी ,
आज तक वैसी ही बनी रही

लाजवाब पंक्तियाँ

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

khoobsurat bhaav.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वर्तमान - भविष्य के मध्य अतीत का
आरम्भ भी वही और अंत भी वही ...

शून्य से निकल कर शून्य में ले जाती हुई शशक्त रचना .........

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut sunder abhivyakti.

रचना दीक्षित ने कहा…

वर्तमान - भविष्य के मध्य अतीत का
आरम्भ भी वही और अंत भी वही ...

आपका वर्तमान भविष्य और अतीत. मेरी भी एक वर्तमान भविष्य और अतीत पर कविता तैयार है .कब पोस्ट कर पाती हूँ पता नहीं

kshama ने कहा…

Behad sundar abhiwyakti...! Kaash mai bhi aisa likh pati!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

कल जैसा था भले ही आज वैसा हो पर भविष्य वैसा नहीं होगा उम्मीद है ......!!

Manoj Bharti ने कहा…

हरकीरत जी से सहमत हूँ ।

अल्पना वर्मा ने कहा…

वर्तमान - भविष्य के मध्य अतीत का

आरम्भ भी वही और अंत भी वही ।
बहुत ही सुंदर बात कह दी आप ने...
पुरानी कविता में भी लेखन कहीं कच्चा नहीं दिखता.
बहुत गहन भाव इन पंक्तियों में.
आभार.