शनिवार, 15 अगस्त 2009

खोज करती हूँ उसी आधार की

फूंक दे जो प्राण में उत्तेजना
गुण वह इस बांसुरी की तान में
जो चकित करके कंपा डाले हृदय
वह कला पायी मैंने गान में
जिस व्यथा से रो रहा आकाश यह ,
ओस के आँसू बहाकर फूल में
ढूंढती इसकी दवा मेरी कला ,
विश्व वैभव की चिता की धूल में
डोलती असहाय मेरी कल्पना
कब्र में सोये हुओ के ध्यान में
खंडहरों में बैठ भरती सिसकियाँ
विरहणी कविता सदा सुनसान में
देख क्षण -क्षण में सहमती हूँ अरे !
व्यापनी क्षणभंगुरता संसार की
एक पल ठहरे जहाँ जग हो अभय ,
खोज करती हूँ उसी आधार की

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आगे इस रचना को प्रकाशित करते समय शब्द इधर उधर हो गए और दोबारा इसे लिखना पड़ाये रचना बहुत पुरानी मेरे मित्र की लिखी है जो मेरे लिए प्रेरणा स्रोत है ,आगे इससे जुड़ी बातें लिख चुकी हूँ

5 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह बहूत ही व्यथा से उपजी हुयी रचना........ मन में उठने वाले क्षोभ को लाजवाब रंग से उतारा है रचना में..

BrijmohanShrivastava ने कहा…

आज मेरे ब्लॉग पर आपका नाम देख कर दोबारा आपके ब्लॉग पर आया |यह रचना चाहे आपके किसी मित्र की हो या किसी और की यह महत्वहीन है |महत्वपूर्ण यह है कि प्रस्तुत आपने की और वह भी इस लिए कि आपको या पसंद है |पसंद क्यों न होगी चकित करके ह्रदय को कपा डाले वह कला इस गान में आपने पायी सही है गान ही ऐसा है |विश्व के बैभव कि चिता में आशय कल्पना का डोलना ,खंडहरों में सिसकियाँ भरना ,क्षणभंगुर संसार में अभय का आधार खोजना |आधार तो केवल एक ही है 'कल युग केवल नाम अधारा "

Babli ने कहा…

बहुत सुंदर भाव के साथ आपने रचना को लाजवाब शब्दों में पिरोया है! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

नमन ! निरंतर नमन .............

अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर भाव हैं।