शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

अदालत ....


कठघरे सा हर घर ,


अदालत तो नही ,


मगर होती पेशी ,


कानूनी कार्यवाही तो नही ,


दाव- पेंच कम नही


हर बात की गवाही भी ,


सबूतों के संग


शायद ,कही रह गई कमी


पारखी नज़र की ,


मिसाल कायम कर सकी


तभी , सच्चाई की


यदि आलम रहा यही


मांगेंगे अपने होने का


सबूत आईने भी




21 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
बहुत सुंदर शब्दों में आपने ज़िन्दगी की हकीकत को बखूबी बयान किया है! उत्तम रचना!

आमीन ने कहा…

bahut achha likha
badhai..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ....

NAARI TO HAR DOUR MEIN IMTIHAAN DETI AAYE HAI ... BAHUT HI ACHAA LIKHA HAI

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाहवा..... सुंदर कविता..

M VERMA ने कहा…

यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
अपने होने का सबूत तो इस अदालत मे देना ही होगा.
बहुत खूबसूरत

kshama ने कहा…

"katghare me eemaan khada kar diya,
Duniyawaalon tumhen kya mil gaya.."
Mujhe meree ye rachna yaad aa gayi..

मनोज कुमार ने कहा…

यहां यथार्थ विस्तृत विवरणों में नहीं, व्यंजनाओं, थ्वनि-संकेतों और परिहास की तहों में है।
है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं
हाथ में हर चीज़ होगी आइना होगा नहीं।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

khud ke hone ka saboot.......bahut khoob

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर. स्त्री की त्रासदी को बहुत सुन्दरता के साथ उकेरा है आपने.

अर्कजेश ने कहा…

बहुत खूब । गूढ अभिव्‍यक्ति ।

Apanatva ने कहा…

bahut sunder rachana . apane hee ghar ka ye roop bhee ho sakata hai ? sonchane par majboor karatee rachana .

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

ज्योति जी,

बहुत अच्छी रचना।

यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

RAJ SINH ने कहा…

बहुत गहरे अर्थ.घर अदालत बन जाये तो .................

ज्योति सिंह ने कहा…

shukriyaan babli ji ,aamin avam digamber ji ,yogendra avam verma ji ,manoj ji avam mukesh ji,arkjesh ji,vandana avam kshama ji ,rashmi ji aur raj ji aap sabhi logo ko tahe dil se shukriyan ,aur aabhari hoon itne umda tippani ke liye ,aksar aesa hota hai apne ghar me begunaah hokar gunhagaar ban jaate hai ,saboot bhi kaam nahi aate ,

शरद कोकास ने कहा…

यह कविता के लिये अच्छा विषय है इसे और विस्तार दीजिये ।

योगेश स्वप्न ने कहा…

यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी


bahut khoob jyoti ji

BrijmohanShrivastava ने कहा…

हम तो मुजरिम नही थे गवाहो में थे
मुजरिमो के संग ही पुकारे गये

वास्तव मे आइना ही एक सहारा है

आईना देख के तसल्ली हुई
शायद इस घर मे जानता है कोई

JHAROKHA ने कहा…

यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
ज्योति जी,
बहुत ही यथार्थपरक रचना--कम शब्द लेकिन काफ़ी धारदार---
पूनम

ज्योति सिंह ने कहा…

aap sabhi ka tahe dil se shukriyaan ,mere hausle ko kayam rakhne ke liye .

संजय भास्कर ने कहा…

शायद ,कही रह गई कमी
पारखी नज़र की ,
LAJWAAB RACHAN

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com