सोमवार, 12 अप्रैल 2010

अस्तित्व .....



धरती की मैं हूँ धूल


गगन को कैसे चूम पाऊं ,


उड़ाये जो हमें आंधियाँ


तो भी आकाश छू पाऊं ,


मैं जुड़ी हुई जमीन से


किस तरह यह नाता तोडू ,


अम्बर की चाहत में बतला


किस तरह यह दामन छोड़ू

21 टिप्‍पणियां:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत बढ़िया विचार हैं

संजय भास्कर ने कहा…

वाह क्या खूब कही आपने !!
काफी भाव पूर्ण रचना ..
बधाई , स्वीकारें ||

संजय भास्कर ने कहा…

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

ज्योति जी मैं फिर से ब्लॉग पर जिंदा हो रहा हूँ .......................आपकी अस्तित्व कविता के साथ .........जी बहुत शुक्रिया .........

Apanatva ने कहा…

bahut sunder bhav......

Manoj Bharti ने कहा…

आकाश की ऊँचाइयाइयाँ पा कर स्वयं को जमीन से जोड़े रखना बहुत बड़ी बात होती है ।

kshama ने कहा…

मैं जुड़ी हुई जमीन से


किस तरह यह नाता तोडू ,


अम्बर की चाहत में बतला


किस तरह यह दामन छोड़ू ।
Ek vinamr bhaav se bharpoor rachana!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मैं जुडी हूँ ज़मीन से
किस तरह नाता तोडूं
अम्बर की चाहत में बतला
किस तरह दामन छोडूँ .....

यही अंतर है पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति में ....!!

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

jyoti ji ,

deri se aane ke liye maafi chahunga... aapko kaaran to pata hi hai ... ab dheere dheere blogging me aa raha hon..

aapki ye kavita mujhe bahut acchi lagi , man ki kashamkash ko darshati hui poem hai ... aapne bahut accha likha hai .. badhayi sweekar kare..

aabhar

vijay
- pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

रश्मि प्रभा... ने कहा…

gahre bhaw..... bahut hi sahaj, komal vichaar

रचना दीक्षित ने कहा…

मैं जुड़ी हुई जमीन से

किस तरह यह नाता तोडू ,

अम्बर की चाहत में बतला

किस तरह यह दामन छोड़ू ।

सच कहा जड़ें जमीं से जुड़ी रहें तभी तक अच्छा है दिल को छू रही है यह कविता

अल्पना वर्मा ने कहा…

सार्थकता इसी में है की ज़मीन से जुड़े रह कर आसमान की बुलंदियाँ हासिल करनी ही होंगी..
लेकिन धूल है इसीलिए ज़मीन छोड़ नहीं सकती आसमान छू नहीं सकती..यह उसकी नियती है..गहन अर्थ लिए पंक्तियाँ.

sangeeta swarup ने कहा…

ज़मीन से जुड़े रहना ही ज़रूरी होता है...बहुत अच्छी रचना

pran ने कहा…

Sundar v sahaj bhavabhivyakti.
Badhaae

manav vikash vigyan aur adytam ने कहा…

vah keyaa baat hai

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

amber ko lakshey maan
dharti ko fateh kar le
apni insaniyat me rah kar hi
log upar hai uthte..

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत ही गहराई लिए हुए रचना \जमीन से जुडी हुयी होने के कारण आकाश छू नहीं सकती |आकाश की चाहत में धरती से नाता तोड़ा नहीं जाता

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गहरी बात .... अपनी ज़मीन छोड़ना आसान नही होता ... बहुत अच्छी रचना है .....

प्रियदर्शिनी तिवारी ने कहा…

BAHUT SHANDAR KAVITA,SHUKRIYA..

ज्योति सिंह ने कहा…

aap sabhi ka tahe dil se shukriya

mridula pradhan ने कहा…

koob achchi lagi.