मंगलवार, 21 सितंबर 2010

आपसी द्वेष


रिश्तों के आपसी द्वेष ,
परिवार का
समीकरण ही बदल देते है ,
घर के क्लेश से दीवार
चीख उठती है ,
नफरत इर्ष्या
दीमक की भांति ,
मन को खोखला करती है ,
ज़िन्दगी हर लम्हों के साथ
क़यामत का इन्तजार
करती कटती है
और विश्वास चिथड़े से
लिपट सिसकियाँ भरती है

15 टिप्‍पणियां:

शरद कोकास ने कहा…

इसीलिये रिश्तों की अहमियत जानना ज़रूरी है । इस अहमियत को बताती बेहतरीन रचना ।

Apanatva ने कहा…

rishte nahee nibh pae to kashtdayak manahsthitee ho jana swabhavik hai.......
acchee post.

M VERMA ने कहा…

रिश्ते जब रिसते है तो ऐसा ही होता है

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

ज्योति जी ,बहुत सुंदर रचना विषय को पूरी तरह से अभिव्यक्त और सार्थक करती हुई
बधाई

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सम्बन्धों को नवजात बच्चे की तरह देखना पड़ता है।

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

यथार्थ चित्रण से रचना सुन्दर बन पड़ी है.

रचना दीक्षित ने कहा…

सच है रिश्ते जिए जिए जाते हैं ढोए नहीं जाते

ZEAL ने कहा…

सुन्दर और सार्थक कविता ।

निर्मला कपिला ने कहा…

सच है सार्थक रचना। बधाई।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

रिश्तों का महत्व बताती सुन्दर कविता.

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत ही मीनिंगफुल कविता...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सही कहा ... इसलिए रिश्तों का महत्व समझ आ रहा है .... बहुत खूब ...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है ज्योति.

निर्झर'नीर ने कहा…

awaysome ..aaj bahut din baad aapke blog pe aana hua .kai rachnayen padhii lekin ye dil mein kahin chubh sii gayii.

sahi kaha aapne ....insan hona bhagy hai or kavi hona shobhagy .

aap yakinan shobhagyshali hai .

daad hazir hai kubool karen