शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

जाल...

कह कर भी

कुछ नही कहा ,

गुमसुम सा हुआ

दिल क्यो यहाँ ,

कितने सवाल

तुम्हारे होठों पे ,

देख रहे हम

इन आंखों से ,

क्या बात हुई जो

हम समझ पाये ,

क्यो कहते -कहते

तुम कह पाये ,

अब तो कुछ

बोल भी दो ,

इस भ्रम को

कही तोड़ भी दो ,

तुम्हारी तो

तुम्ही जानो ,

पर इस बन्दे पे

रहम करो ,

संदेह का यह

जाल बिछाकर ,

दूरी यू

बसर करो

7 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

कितने सवाल
तुम्हारे होठों पे ,
देख रहे हम
इन आंखों से ,
क्या बात हुई जो
हम समझ न पाये ,
क्यो कहते -कहते
तुम कह न पाये ,
कुछ बाते ऎसी होती है जो बोल कर अपना अर्थ ही खो देती है, यह शव्द भी अन बोले बहुत कुछ कह जाते है.
बहुत ही सुंदर कविता.
धन्यवाद

योगेश स्वप्न ने कहा…

BAHUT SUNDER ABHIVYAKTI, KYA AAP BOL PAAIN JO AAPNE LIKHA, MAIN RAJ BHATIA JI SE SAHMAT HUN.

ज्योति सिंह ने कहा…

shukriya raj ji ,yogesh ji aakar itni sundar tippani diya aapne iske liye aabhari hoon .

Manoj Bharti ने कहा…

सुंदर भाव लिए सुंदर कविता के लिए बधाई ।

Babli ने कहा…

अत्यन्त सुंदर और लाजवाब रचना के लिए बधाइयाँ!
मेरे इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

कह कर भी
कुछ नही कहा ,
गुमसुम सा हुआ
दिल क्यो यहाँ ,

wakai Jyoti ji...
Kabhi keh kar bhi kuch nahi keh paate aur kabhi bin kahe hi dil kitna kuch bol samajh leta ha na?

FLAWLESS !!

ज्योति सिंह ने कहा…

babli ji ,manoj ji aur darpan ji shukriya