जियो और जीने दो ....
बात अपनी होती है तब जीने की उम्मीद को रास्ते देने की सोचते है वो , बात जहाँ औरो के जीने की होती है , वहाँ उनकी उम्मीद को सूली पर लटका बड़े ही आहिस्ते -आहिस्ते कील ठोकते हुये दम घोटने पर मजबूर करते है । रास्ते के रोड़े , हटाने की जगह बिखेरते क्यों रहते हैं ? ........................................ इसका शीर्षक कुछ और है मगर यहाँ मैं बदल दी हूँ क्योंकि यह एक सन्देश है उनके लिए जो किसी भी अच्छे कार्य में सहयोग देने की जगह रोक -टोक करना ज्यादा पसंद करते .
टिप्पणियाँ
धन्यवाद
शुभकामनायें .
दिल के बोझ को कम कर लो..
सच है गुबार निकल जाने पर सब कुछ सामान्य हो जाता है ... अच्छी रचना है ..
aapke ye line achha laga..."ehsason ka yedarbar hai"
ऐसे मौके कब आयेंगे ?