मंगलवार, 5 मई 2009

मानवता का 'स्वप्न'

कैसा दुर्भाग्य ? तेरा भाग्य
सर्वोदय की कल्पना ,
बुनता हुआ विचार,
स्वर्णिम कल्पना को आकार देता ,
खंडित करता , फिर
उधेड़ देता लोगों का विश्वास ,
नवोदय का आधार
फिर भी आंखों में अन्धकार ।
इच्छाओं की साँस का
घोटता हुआ दम ,
अन्तः मन का द्वंद प्रतिक्षण ।
भाव - विह्वल हो कांपता ,
अकुलाता भ्रमित - स्पर्श ,
टूट कर भी निःशब्द ,
मानवता का 'स्वप्न ' ।


7 टिप्‍पणियां:

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत हीं सुन्दर रचना.

गुलमोहर का फूल

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut bahut shukriya

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

"स्वर्णिम कल्पना को आकार देता ,
खंडित करता , फिर
उधेड़ देता लोगों का विश्वास"
बहुत सुन्दर...........बधाई.

रवीन्द्र दास ने कहा…

itni nirasha itna avishvas kyon, jyoti singh ji?

SWAPN ने कहा…

मस्त हूँ. व्यस्त हूँ, और स्वस्थ हूँ
आपके ही स्नेह में अनुरक्त हूँ
ये कविता है मेरा जीवन नहीं
अंशतः व्यक्त औ अंशतः अव्यक्त हूँ.

kya baat hai aajkal sabhi swapn ke peechhe pade hain aaj hi 3-4 post swapn se sambandhit padhin. dhanyawaad. han. bhut sarahniya rachna.

ज्योति सिंह ने कहा…

achhe kamo me agar nakamyabi dakhal deti hai to nirasha jahir hai .desh ki sthiti aur logo ke ravaiye se aap anjaan to nahi ravindra ji .shukriya

ज्योति सिंह ने कहा…

swapn aur aadmi ka choli-daman jaisa saath hai .peechhe to rahata hi nahi .saath hi aata -jaata hai .sarahne ke liye shukriya .aapki kavita bhi sundar hai .