सोमवार, 18 मई 2009

तकाजा

कुछ इज़हार है , कुछ इकरार है ,
अहसासों का ये दरबार है ,
चाहो तो , कुछ तुम भी कह लो ,
दिल के बोझ को कम कर लो ,
फिर ऐसे मौके कब आयेंगे ,
जहाँ हाल दिल के कह पायेंगे ,
दोष न देना ऐसे मौके को ,
ये खता न ख़ुद से होने दो

7 टिप्‍पणियां:

pukhraaj ने कहा…

दिल की बातें हैं ...दिल ही जानता है ...
.खता दिल करता है भुगतना सम्पूर्ण
अस्तित्व को पड़ता है

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut khoob kaha aur sach bhi . shukriya pukhraaj ji .

Kishore choudhary ने कहा…

फिर से सुन्दर

ज्योति सिंह ने कहा…

kishore ji bahut-bahut dhanwaad .

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सचमुच सुन्दर.

MAYUR ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति
आप अच्छा लिखते हैं ,आपको पढ़कर खुशी हुई
साथ ही आपका चिटठा भी खूबसूरत है ,

यूँ ही लिखते रही हमें भी उर्जा मिलेगी ,

धन्यवाद
मयूर
अपनी अपनी डगर

ज्योति सिंह ने कहा…

mayur ji ,vandana ji aap dono ka shukriya .mayur ji aapki taarif se meri urja shakti badh gayi .