शुक्रवार, 15 मई 2009

एक वो रात

वो राते लम्बी होती है ,
जब तन्हाई डसती है ,
यादे बोझिल होती है ,
तब ये नींद कहाँ पे सोती है ,
ये रात जो मुझ पे भारी है ,
आँखों-आँखों में कटती है ,
करवट की आहट होती है ,
लिए दर्द मचलती रहती है ,
नींद को तलाशते ,
आँखों में सुबह होती है

10 टिप्‍पणियां:

Kishore choudhary ने कहा…

इस बार की कविता खूबसूरत होने के साथ साथ अपील भी करती है, एक अलग मूड को आपने सुन्दरता से व्यक्त किया है, आपकी कई कवितायेँ पढी है मैंने, सब में अलग अलग रस का निष्पादन हुआ करता है.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना. बाकी की बात किशोर जी ने कह ही दी है.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना.....

SWAPN ने कहा…

वो राते लम्बी होती है ,
जब तन्हाई डसती है ,

sach hai, tanhai kaate nahin katti hai.

ज्योति सिंह ने कहा…

is raat ki tanhai aap sabhi ke sahyog se door ho gayi .bahut bahut shukriya aap sabo ka .kishore ji aapke shabd to tonic ka kaam karte hai .

Prem Farrukhabadi ने कहा…

आँखों-आँखों में कटती है ,
करवट की आहट होती है ,

ज्योति सिंह ने कहा…

kai raato se jyada ek raat ye bhari hoti hai .shukriya prem ji aap mere blog pe padhare main abhari hoon .

sifar ने कहा…

I have read almost all of your posts since last weekend.........it's simply marvellous piece of work.
One thing what I observed, you never force yourself to write....it seems everything came straight from heart....

ज्योति सिंह ने कहा…

kahne ko bahut kuchh phir bhi koi alphaaj nahi .is hakikat par kya byan kare .bas ek shukriya .

Rajat Narula ने कहा…

बहुत ही सशक्त रचना है... simply superb...