शुक्रवार, 22 मई 2009

ज़िन्दगी

ये धूली-धूली सी ,
ये महकी -महकी सी ।
ओस के बिखरे बूंदों सी ,
हवा सी बहती जाए
आहिस्ते सरकती जाये कही ,
इसे सुबह की प्याली सी
चुस्की लेते हुए हर कही
पीते जा रहे है सभी ,
ये ज़िन्दगी जी रहे है सभी ,
कही -कही अनसुनी सी ,
कभी सूनी -सूनी सी ,
कुछ कहते अपने में ही ,
कुछ कहते-कहते ठहरी ,
गुमसुम सी होकर खड़ी ,
हलकी मुस्कान की लिए हँसी ,
लपेटे चल रहे हैं सभी
ये ज़िन्दगी जी रहे हैं सभी ,
ये ज़िन्दगी है सब को प्यारी
हर पन्ने पर लिखती कहानी नई ,
मन को जोड़ती हुई
सुबह से शाम चलती यूँ ही
रात को थक कर सो जाती
आंखों पर रखकर सपने कहीं
चाहें हँसी चाहें नमी
ये ज़िन्दगी जी रहे हैं सभी




11 टिप्‍पणियां:

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर ने कहा…

sunder kavita
thanx

Kishore choudhary ने कहा…

मन को जोड़ती हुई
सुबह से शाम चलती यूँ ही
रात को थक कर सो जाती

सुन्दर कविता , बधाई हो !

ज्योति सिंह ने कहा…

shukriya kishore ji ,tiger ji .liye sukh-dukh ke prasang sahi ,har haal me behatar hai kahi .ye zindagi bahut anmol hai sabki .

श्यामल सुमन ने कहा…

हलकी मुस्कान की लिए हँसी ,
लपेटे चल रहे हैं सभी
ये ज़िन्दगी जी रहे हैं सभी ,

वाह। सुन्दर पंक्तियाँ।

छीनकर खुशियाँ हमारी अब हँसी वे बेचते।
दिख रहा वो व्यावसायिक झूठी सी मुस्कान है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ज्योति सिंह ने कहा…

waah aapne bhi bahut khoob kaha .zindagi ke bojh me hansi dab gayi ,bahane ki ab mohtaaj ho gayi .achchaa laga bahut shukriya .

Suman ने कहा…

good

sifar ने कहा…

Like always.........simply great.
Just one thing is missing, if possible then from next post please take care of commas, full stop, etc...
Actually that really help to the readers to get the feel of the poetry.

Above all of this, I am totally flattered by your way of expression.

ज्योति सिंह ने कहा…

sifar ji aur suman ji dhanyawaad ,sifar ji aapki shikayat jayaz hai .lekin light ke jaane ki wajah se jaldi likhna pada aur commas chodna pada .lekin full stop diya tha pataa nahi kyo nahi aa paya .aage se is baat ka dhyan barabar rakhungi .maarg dashan ke liye shukriya .

MUFLIS ने कहा…
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MUFLIS ने कहा…

सुबह से शाम चलती यूँ ही
रात को थक कर सो जाती
आंखों पर रखकर सपने कहीं
चाहें हँसी चाहें नमी
ये ज़िन्दगी जी रहे हैं सभी

एक सार्थक और मननीय रचना
लफ्ज़-लफ्ज़ खूबसूरत इज़हार ....
बधाई

---मुफलिस---

संजय भास्कर ने कहा…

वाह। सुन्दर पंक्तियाँ।

छीनकर खुशियाँ हमारी अब हँसी वे बेचते।
दिख रहा वो व्यावसायिक झूठी सी मुस्कान है।।