आपबीती
तुम्हारे ओस रुपी अश्क से ये , नमी क्यो झलक रही है ? कौन सी व्यथा की ये लकीर खीँच रही है । किस दर्द भरी दास्ताँ को बयां कर रही है । ऐ अजनबी ये तेरी आँखे , उदास लग रही है । खामोश निगाहें तुम्हारी जुबां बन गई है , छिपाओ न और ज़ख्म बहुत कुछ कह गई है । क्योकि हम सब के जो किस्से है , वही तो बुन रही है । आपबीती अपने आप को दोहरा रही है ।