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लेन -देन

पाना है तो देना है बात समझ ये लेना है । बात बराबर न हो तो बोझ न मन पर लेना है । तुम बेहतर हो ,कहकर मन को समझा लेना है । मौका कहाँ ये सबको मिलता बस इतना जान  लेना है । रब तुम पर है मेहर...

औरत

बहुत कुछ बदला है बहुत कुछ बाकी है। एक रोज़ वो सबकुछ मिलेगा, औरत जो यहाँ चाहती है।

बदलते रंग

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रुख हवाओ का बदला तो सब कुछ बदल गया , दिशा बदल गयी रास्ते बदल गये , ख्वाहिशो के रंग उतरकर नये रंगों में ढल गये , सूरते भी आईने में बदलती नज़र आई , रिश्तो के मायने नई भूमिका सजाई , मोटे - मोटे अक्षरों को हमने रेखांकित किया , और हर शब्द को व्याख्यायित किया ।

आशाओ के दीप जलाये

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हर बार ये कहते आये है हर बार ये सुनते आये है , इस तिरंगे के नीचे हमने बहुत से प्रण उठाये है । पर इस पर्व के जाते ही हम सब बिसर जाते है , सिर्फ कोरे वादे करके ही सच्चे देशभक्त बन जाते है । अपने वीरो जैसा जुनून हम क्यों नही पैदा कर पाये , जो देकर आहुति प्राणों की इस देश की जान बचाये । धरती माँ के पोछे आंसू सीना छलनी होने से बचाये , बनके उनके सच्चे सपूत जीवन को सफल बनाये । हो हरियाली इस धरती पर आशाओ के दीप जलाये । जय हिंद । सभी बंधुओ को गण तंत्र दिवस की हार्दिक बधाई , सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा । मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना , प्राण मित्रो भले ही गवाना , पर न झंडा ये नीचे झुकाना । वन्दे मातरम् वन्दे मातरम वन्दे मातरम् ।

आधुनिकता ........

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आधुनिक ता परिधानों में नही आधुनिकता दिखावे में नही , आधुनिकता झलकती है अपने विचारो से , आधुनिकता दिखती है अपने व्यवहारों में , आधुनिकता सुसंस्कार में आधुनिकता पावन प्यार में । अश्लीलता से सर झुकता है अभद्रता से रिश्ता टूटता है , रेशमी परदे से हालात ढकते नही कर्जो पर शान - शौकत टिकते नही , शालीनता में रहकर शिष्टता निभाये अपनी सुसंस्कृति को आगे बढ़ाये , धर्म के नाम पर झंडे न लगाये जाति - पाति पर सवाल न उठाये । जहाँ भूख बिलखती है दो रोटी के आस में , पेट को वो ढकती है अपने दोनों पाँव से , लाचार खड़ा होता है आदमी जहाँ इलाज में , घर छीन लिया जाता जहाँ वृद्धों के हाथ से , भेद भाव पनपते है यहाँ अमीरी - गरीबी से , इमानदारी खरीद ली जाती नोटों की गड्डी से । हालात जिस देश के हो इतने गरीब बेचकर इंसानियत और जमीर , हम कैसे कह सकते है कि हम है यहाँ आधुनिक ।
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है कठिन जमाना लिए कठिन दर्द अन्याय की दीवारों में , जख्मो की बेड़िया पड़ी हुई है परवशता के विचारो में । रोते -रोते शमा के अश्क बदल गये अब सिसकियो में , हर दर्द उठाती है मुस्कान इस बेदर्द जमाने में । छुपाये नही छिपते है आंसू हकीकत के इन आँखों में , एक जीत नजर आती है जिंदगी जीवन के इन हारो में । रात को रौशन कर देगी कभी चाँदनी अपने उजालो में ।

सब का मालिक एक है

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ईश्वर हो या अल्लाह वो कहता बस यही , हमे न चाहिए कोई जमीं और न इमारत बड़ी -बड़ी । मैं तो हूँ कण -कण में जीवन के हर धड़कन में , याद करोगे जिस जगह मिलूंगा तुम्हे मैं वही । नाम हमे चाहे जो दे दो इबादत तो है एक ही , बाँट रहे हो क्यों हमको हम तो है सबके ही । मैं तो नेक इरादों में मानवता की राहो में , प्रेम के निर्मल भावो में इंसानियत से बढ़कर नही होता धर्म कोई । धर्म सभी होते है सच्चे अहसास सभी होते एक से , वही इनायत बरसेगी फर्क जहां न होगा कोई । हमने तो नही सिखाया तुम्हे करना भेद कभी , न कोई हिन्दू न कोई मुस्लिम है केवल यहाँ इंसान सभी । ......................................................... इस रचना को फैसले के पहले ही डालना था ,इसे मैं भोपाल में लिखी रही जब वहां गयी थी ,उस समय गणेश चतुर्थी रही मगर लौटने के बाद सोचते -सोचते समय निकल गया फिर संकोच में नही डाल सकी ,मगर कल अपने मित्र के यहाँ जाकर जब इसे पढायी तो उसने कहा तुरंत डाल दो ,और आज डाल पा...

आपसी द्वेष

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रिश्तों के आपसी द्वेष , परिवार का समीकरण ही बदल देते है , घर के क्लेश से दीवार चीख उठती है , नफरत इर्ष्या दीमक की भांति , मन को खोखला करती है , ज़िन्दगी हर लम्हों के साथ क़यामत का इन्तजार करती कटती है । और विश्वास चिथड़े से लिपट सिसकियाँ भरती है ।

धुंध

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अश्को का सैलाब डबडबा रहा है आंखों में , फिर भी एक बूँद पलको पर नही , निशब्द खामोशी भरी उदासी कहने को बहुत कुछ पास में , परन्तु बिखरी है संशय की धुंध भरी नमी सी , कितनी दुविधापूर्ण स्थिति होती है यकीन की ।

दर्द ..

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आहिस्ता - आहिस्ता दर्द घर में पैर जमाता रहा _ और कुछ हल्की कुछ गहरी छाप अपनी शक्ल की छोड़ता रहा । हम इसकी आमद से घबराते रहे , ये अपना राज फैलाता रहा ।

शिल्प -जतन

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नीव उठाते वक़्त ही कुछ पत्थर थे कम , तभी हिलने लगा निर्मित स्वप्न निकेतन । उभर उठी दरारे भी व बिखर गये कण - कण , लगी कांपने खिड़की सुनकर भू - कंपन , दरवाजे भी सहम गये थाम कर फिर धड़कन । जरा सी चूक में टूट रहे सब बंधन , शिल्पी यदि जतन करता , लगाता स्नेह और समानता का गारा , तब दीवारे बच जाती दरकने से और संभल जाता ये भवन ।

पत्थरों का ये स्रोत ..

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क्या लिखूं क्या कहूं ? असमंजस में हूँ , सिर्फ मौन होकर निहार रही बड़े गौर से पत्थर के  छोटे - छोटे टुकड़े , जो तुमने बिखेर दिये है मेरे चारो तरफ , और सोच रही हूँ कैसे बीनूँ इनको ? एक लम्बा पथ तुम्हे बुहार कर दिया था , मैंने और तुमने उसे जाम कर दिया कंकड़ पत्थर से । पर यहाँ सहनशीलता है कर्मठता है और है इन्तजार करने की शक्ति , ठीक है , तुम बिखेरो हम हटाये , आखिर कभी तो हार जाओगे , और बिखरे पत्थर सहेजने आओगे , और खत्म होगा पत्थरों का ये स्रोत । ""''"""""""""""""""""""" मौन होकर निहार रही हूँ  तेरे बिखेरे पत्थरों को ... मैं तो फिर भी चल लुंगी  कभी जो चुभ जाये तेरे ही पैरों में  पुकार लेना .... शायद तुम वो दर्द  सहन न कर पो .....

संगत

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स्वाती की बूँद का निश्छल निर्मल रूप , पर जिस संगत में समा गई ढल गई उसी अनुरूप । केले की अंजलि में रही वही निर्मल बूँद , अंक में बैठी सीप के किया धारण मोती का रूप , और गई ज्यो संपर्क में सर्प के हो गई विष स्वरुप । मनुष्य आचरण जन्म से कदापि , होता नही कुरूप , ढलता जिस साँचे में बनता उसका प्रतिरूप ।

चल तो लूंगी ..........

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कब तक और ____ कहाँ तक इन्तजार में खड़े रहकर तुम्हारे सहारे को तकते रहें __ कभी तो कहीं तो तुम छोड़ ही दोगे ऊब कर । बैसाखी तो हो नही जो पास में रख लू । इतना ही काफी है जो तुमने खड़ा कर दिया ___ दौड़ भले न पाऊं तुम्हारे बगैर , मगर चल तो लूंगी अब , धीरे - धीरे ही सही गिरते - पड़ते लड़खड़ाते , एक दिन दौड़ने भी लगूंगी ।

यकीन

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यकीं बन कर आए चाहो तो रोक लो , वरना क्या जाने कब धुँआ बन उड़ जाए । इस एतबार का कुछ कहा न जाए , कुछ प ल पहले साथ आगे धोखा दे जाए ।