संदेश

ख्वाब

चित्र
ख्वाब ... ख्वाब एक निराधार बेल की तरह, बेलगाम ख्याल की तरह , असहाय डोलती कल्पना है , जो हर वक़्त कब्र खोद कर ही ऊँची उड़ान भरती है , क्योंकि उसका दम तोड़ना निश्चित...

संगत ........

स्वाती की बूँद का निश्छल निर्मल रूप , पर जिस संगत में समा गई ढल गई उसी अनुरूप । केले की अंजलि में रही वही निर्मल बूँद , अंक में बैठी सीप के किया धारण मोती का रूप , और गई ज्...

मानवता का स्वप्न

चित्र
मानवता का स्वप्न कैसा दुर्भाग्य ?  तेरा भाग्य सर्वोदय की कल्पना , बुनता हुआ विचार, स्वर्णिम कल्पना को आकार देता , खंडित करता ,  फिर उधेड़ देता लोगों का विश्व...

शिल्प-जतन

नीव उठाते वक़्त ही कुछ पत्थर थे कम , तभी हिलने लगा निर्मित स्वप्न निकेतन । उभर उठी दरारे भी व बिखर गये कण -कण , लगी कांपने खिड़की सुनकर भू -कंपन , दरवाजे भी...

कुछ बूंदे कुछ फुहार

______________________________ कुछ बूंदे कुछ फुआर तफसीर जब बेबसी का हुआ  त्यों ही मुलाकात आंसुओ ने किया , आगाज़ होते किस्से गमे-तफसील के साथ  पहले उसके अश्को ने गला रुंधा दिया ।  _______________________________ जिसके चेहरे प...

ख्वाहिशों को रास्ता दूँ

आज सोचा चलो अपनी ख्वाहिशो को रास्ता दूँ , राहो से पत्थर हटाकर उसे अपनी मंजिल छूने दूँ , मगर कुछ ही दूर पर सामने पर्वत खड़ा था अपनी जिद्द लिए अड़ा था , उसका दिल कहाँ पिघलता वो मुझ जैसा इंसान  नही था  , स्वप्न उसकी निष्ठुरता पर  खिलखिलाकर हँस पड़े  , हो बेजान , अहसास क्या समझोगे हद क्या है जूनून की ,कैसे जानोगे ? आज न सही कल पार कर जायेंगे उड़ान भर कर आगे नि कल  जायेंगे ।

खामोशी

खड़ी खड़ी मैं देख रही मीलों लम्बी खामोशी । नहीं रही अब इस शहर में पहले जैसी  हलचल सी खामोशी का अफसाना ,क्यों ये वक़्त लगा है लिखने जख्मों से हरा भरा ,क्यों ये शहर लगा है दिखने देक...