जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
किसी तूफ़ान का ज़िक्र न करो ।
वाकई माहौल जब खुशनुमा हो तो विसंगतियों का जिक्र भी फीका कर देती है
बहुत सुन्दर
बहुत बढ़िया ,
आप की इच्छा सही है ,
माहौल को ख़ुश्गवार बनाना इंसान के अपने
हाथ में होता है
किसी तूफ़ान का ज़िक्र न करो ..
सच है खुशियों की बात जब हो ... तो गम का ज़िक्र क्यों ... अच्छा लिखा है ....
जुस्तजू सिमटी हो बाँहों में ,
ऐसे खुशनुमा माहौल में
किसी तूफ़ान का ज़िक्र न करो ।
ज्योति सिंह द्वारा 10:32 AM पर Jun 8,
वाह आप तो आते ही छा गयीं
isee shubhkamna ke sath......
AUR KYUN NA HOGI.....
ITNI MAASOOM AUR KHOOBSOORAT JO HAI!
SAADAR VANDE!
उमंग भरी मौज की कश्ती में सवार आकांशा की वधू खुशियों से यूँ ही चहकती रहे .
बहुत प्यारा सा अनुरोध है..