मनुष्य जीवन ......
जीवन की अवधि और दुर्दशा चीटी की भांति होती जा रही है , कब मसल जाये कब कुचल जाये , कब बीच कतार से अलग होकर अपनो से जुदा हो जाये । भयभीत हूँ सहमी हूँ मनुष्य जीवन आखिर अभिशप्त क्यों हो रहा ? कही हमारे कोसने का दुष्परिणाम तो नही या कर्मो का फल ?