पहचान ......
मेरा वास्ता इंसानियत से रहा अहम से नही , मैं साधारण ही रहना चाहती बड़े होने की ख्वाहिश कतई नही , मेरी नजरों ने कितने ही नाम वालों के चेहरे पढ़े , जो पहचान अपनी अब भी ढूँढ रहे है । शोहरत की सोहबत में वजूद ही कही उनके , गुमनाम से हो गये । अनगिनत रिश्तों में भी तन्हाई है रौंद रही , क्योंकि उनकी तलाश मंजिल के आगे भी है , किसी उस शक्स की जो नाम से नही पहचान कायम करे , बल्कि इंसानियत की नींव बनाये ।