गुरुवार, 12 सितंबर 2019

अधूरी आस


ख्यालो की दौड़ कभी

थमती नही

कलम को थाम सकू

वो फुर्सत नही ,

जब भी कोशिश हुई

पकड़ने की

वक़्त छीन ले गया ,

एक पल को भी

रूकने नही दिया ,

सोचती हूँ

इन्द्रधनुषी रंग सभी

क्या बादल में ही

छिप कर रह जायेंगे ,

या जमीं को भी

कभी हसीं बनायेंगे l

6 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 13 सितंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Jyoti Singh ने कहा…

आपकी तहे दिल से आभारी हूँ ,यशोदा जी

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (14-09-2019) को " हिन्दीदिवस " (चर्चा अंक- 3458) पर भी होगी।

--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी

Abhilasha ने कहा…

बेहतरीन रचना

Nitish Tiwary ने कहा…

बहुत सुंदर रचना.
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत मर्मस्पर्शी....कई भावों को संजोये