जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
Aapki sabhi rachnayen sulajhi huee....anbhavse tarashe huee..hoti hain..
आहिस्ते -आहिस्ते
आज फिसल गया ,
बहुत अच्छे भाव, इसी तरह बहुत कुछ पीछे छोड़कर हम आगे बढ़ते जाता हैं।
बहुत कुछ याद रक्खा ,
सहेजते -सहेजते
क्या कुछ न गवा दिया ,
बहुत सुंदर लिखा आप ने, बहुत गहरे भाव.
धन्यवाद
Khatas par aapakee tippanee ka intzar hai .
और याद बनकर
अतीत ठहर गया ।nice
क्या ज्योति जी इतनी मुश्किल से बाहर आ पाती हूँ और आप हैं कि फिर वहीँ भेज देती हैं
बहुत कुछ याद रक्खा ,
सहेजते -सहेजते
क्या कुछ न गवा दिया ,
जो वक्त पकड़ सका
वो संभल गया ,
जो मन न सह सका
वो पिघल गया ,
रेत की तरह
आहिस्ते -आहिस्ते
आज फिसल गया ,
और याद बनकर
अतीत ठहर गया ।
बहुत सादगी और सरलता के साथ जिन्दगी की गहराई को नापती रचना ... बहुत सुन्दर.... बधाई
बहुत कुछ याद रक्खा ,
सहेजते -सहेजते
क्या कुछ न गवा दिया ,
बहुत गहरे भाव हैं.
महावीर शर्मा
विचारों की उथल पुथल के लिये उपयुक्त शब्दों का चयन किया है आपने.
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
अच्छी रचना