जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
बहुत सुंदर शब्दों में आपने ज़िन्दगी की हकीकत को बखूबी बयान किया है! उत्तम रचना!
badhai..
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ....
NAARI TO HAR DOUR MEIN IMTIHAAN DETI AAYE HAI ... BAHUT HI ACHAA LIKHA HAI
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
अपने होने का सबूत तो इस अदालत मे देना ही होगा.
बहुत खूबसूरत
Duniyawaalon tumhen kya mil gaya.."
Mujhe meree ye rachna yaad aa gayi..
है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं
हाथ में हर चीज़ होगी आइना होगा नहीं।
बहुत अच्छी रचना।
यदि आलम रहा यही
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी
bahut khoob jyoti ji
मुजरिमो के संग ही पुकारे गये
वास्तव मे आइना ही एक सहारा है
आईना देख के तसल्ली हुई
शायद इस घर मे जानता है कोई
मांगेंगे अपने होने का
सबूत आईने भी ।
ज्योति जी,
बहुत ही यथार्थपरक रचना--कम शब्द लेकिन काफ़ी धारदार---
पूनम
पारखी नज़र की ,
LAJWAAB RACHAN