जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
Behad khoobsoorat rachana!
आपकी कलम को शुभ कामनाएं
सब कुछ बदल गया ,
दिशा बदल गयी
रास्ते बदल गये ,
ख्वाहिशो के रंग उतरकर
नये रंगों में ढल गये ,
सुन्दर कविता है ज्योति जी. बधाई.
सब कुछ बदल गया ,
दिशा बदल गयी
रास्ते बदल गये ,
ख्वाहिशो के रंग उतरकर
नये रंगों में ढल गये ,
बहुत बढ़िया !
सुन्दर लेखन
सूरते भी आईने में बदलती नज़र आई.
रिश्तों के मायने
नई भूमिका सजाई !
वाह,ज्योति जी,
ज़माने के बदलते रंगों को आपने बहुत ही खूबसूरती से परिभाषित किया है !
सब कुछ बदल गया ,
दिशा बदल गयी
रास्ते बदल गये ,
ख्वाहिशो के रंग उतरकर
नये रंगों में ढल गये ,
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है ...रुख बदल जाने से जीवन में बहुत कुछ बदल जाता है।
सब कुछ बदल गया ,
दिशा बदल गयी
रास्ते बदल गये ,
ख्वाहिशो के रंग उतरकर
नये रंगों में ढल गये ,
सुन्दर लेख । वाकई, रुख हवाओ का बदले तो बदल जाती है ज़िन्दगी ।
सब कुछ बदल गया ,
दिशा बदल गयी
रास्ते बदल गये ,
ख्वाहिशो के रंग उतरकर
नये रंगों में ढल गये ,......
मनोभावों को खूबसूरती से पिरोया है। बधाई।
नई भूमिका सजाई ,
मोटे -मोटे अक्षरों को
हमने रेखांकित किया ,
सच्चाई को वयां करती आपकी यह रचना ....जीवन सन्दर्भों को उद्घाटित करती है ...आपका शुक्रिया