जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
नमस्कार !
बहुत अच्छी लगी आपकी रचना ।
आपकी कलम को सलाम
प्रणाम.
सुबह भी जगाने आई ।
क्या बात है तन्हाई का आलमे बयां. बहुत बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिए.
क्या खूब तन्हाई के आलम का बयां किया है.
सलाम
सुबह भी जगाने आ गई...
वाह...नयापन है कलाम में
बधाई स्वीकार करें ज्योति जी.
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (28-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com/
Kharab tabiyat ke karan 2/4 din net pe nahee aa saki,isliye der se tippanee de rahi hun! Kshama chahti hun.
और जागते को सुबह भी जगाने आई ...
तन्हाई का बेहतरीन चित्रण । बहुत अच्छी रचना !
ये क्या कह दिया ज्योति जी आपने.
तन्हाई के आलम का ऐसा बयां कि सुबह की
चेष्टा भी ओपचारिकतामात्र ही रह गयी .आपकी काव्यांजलि का बहुत बहुत आभार .
और जागते को
सुबह भी जगाने आई
कमाल
सही कहा है आपने ! शुभकामनायें आपको !!