आज के दिन ही हम एक हुए थे....कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया, याद ही नहीं। लगता है कल की ही तो बात थी........ अहसास कभी उम्र नहीं पाते , कितनी सच्ची बात है ये। जीवन की ऊंची-नीची डगर पर चलते हुए कब एक अजनबी इतना अपना हो जाता है पता ही नहीं चलता.... ..... सुख-दुख के साझेदार हुए, जीवनभर के साथ हुए। कानों में संगम के गीत प्रिये, तुम तो मेरे मीत प्रिये। आंसुओं से भीगे हुए, पलकों पर कुछ अद्भुत सपने, हमने जो आँखों में समां लिए, तुम तो मेरे मीत प्रिये। उजियाले का अधिकार लिए, मिटा तम के आकर्षण प्रिये। ढलते सूरज को दे आवाज़, हर हार को निरस्त करके, मुश्किलों में मुस्कान लिए, तुम तो मेरे मीत प्रिये। इस जीवन के गीतों के स्वर नहीं आसान प्रिये, जहां मिले स्वर हमारा मधुर वही संगीत प्रिये। चलते रहे अगर साथ यूं ही, हर मुश्किल है आसान प्रिये, तुम तो मेरे मीत प्रिये, जीवन का संगीत प्रिये.
टिप्पणियाँ
a thought provoking post !!
खूबसूरत रचना
aajkal har cheez out of limit hoti ja rhi hain
बहुत ऊंचाई तक
पहुँचने के प्रयास में
नई तकनीक की
तलाश में
अपना वजूद न मिटा दे ,
बहुत सुंदर और सार्थक रचना !!!!!!!!!
साभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com
सिर्फ तन्हा होने का
ख्याल डस रहा है ,
कल सारी धरती ही
तन्हा न हो जाये .....
बहुत ही सार्थक लेखन के साथ विचारणीय प्रश्न भी ..
आप जितना उपर जाते हो, वो उतनी सकरी होती जाती है.
और आप अकेले होते जाते हो.
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क्या मानवता भी क्षेत्रवादी होती है ?
बाबा का अनशन टुटा !
महाप्रलय शरीर की ही हो सकती है,आत्मा की नहीं. कबीरदास जी कहते हैं
'झूंठे सुख को सुख कहें, मानत हैं मन मोद
जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद'
जीवन काल में हम आत्म ज्ञान प्राप्त करलें यही सबसे बड़ी ऊँचाई पर पहुँच पाने की तकनीक है.
आपके ब्लॉग पर देरी से आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ.
मर जाएगा तू मत सोचा कर ...
...शायद इस विकास में ही कुछ बेहतर निकल आए ...
sunder kavita
rachana
शुक्ल भ्रमर ५