जिंदगी यूं ही गुजरती है यहाँ दर्द के पनाहों में , क्षण -क्षण रह गुजर करते है पले कांटो भरी राहो में । .................................................... हर दिन गुजर जाता है वक़्त के दौड़ में , आवाज विलीन हो जाती है इंसानों के शोर में । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, वफ़ा तब मोड़ लेती है जमाने के आगे , न जलते हो कोई जब उम्मीदों के सितारे । ===================== उन आवाजो में पड़ गई दरारे जिन आवाजो के थे सहारे । >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> अपनो के शहर में ढूँढे अपने , पर मिले पराये और झूठे सपने । अनामिका के आग्रह पर बचपन की कुछ और रचनाये डाल रही हूँ , जो दसवी तथा ग्यारहवी कक्षा की लिखी हुई है ।
टिप्पणियाँ
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दुविधापूर्ण चिंतन में ,
तो देती परिस्थति गवाही
वहां जीवन - संघर्ष की ।
बहुत सही कहा आपने।
दुविधापूर्ण चिंतन में ,
तो देती परिस्थति गवाही
वहां जीवन - संघर्ष की
हर एक शब्द बोलता हुआ, अपनी बात को पुरजोर तरीके से सामने रखता हुआ और हमें इस जीवन संघर्ष में सतत प्रयासरत रहने की प्ररणा देता हुआ
बधाई स्वीकारें
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