आज के दिन ही हम एक हुए थे....कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया, याद ही नहीं। लगता है कल की ही तो बात थी........ अहसास कभी उम्र नहीं पाते , कितनी सच्ची बात है ये। जीवन की ऊंची-नीची डगर पर चलते हुए कब एक अजनबी इतना अपना हो जाता है पता ही नहीं चलता.... ..... सुख-दुख के साझेदार हुए, जीवनभर के साथ हुए। कानों में संगम के गीत प्रिये, तुम तो मेरे मीत प्रिये। आंसुओं से भीगे हुए, पलकों पर कुछ अद्भुत सपने, हमने जो आँखों में समां लिए, तुम तो मेरे मीत प्रिये। उजियाले का अधिकार लिए, मिटा तम के आकर्षण प्रिये। ढलते सूरज को दे आवाज़, हर हार को निरस्त करके, मुश्किलों में मुस्कान लिए, तुम तो मेरे मीत प्रिये। इस जीवन के गीतों के स्वर नहीं आसान प्रिये, जहां मिले स्वर हमारा मधुर वही संगीत प्रिये। चलते रहे अगर साथ यूं ही, हर मुश्किल है आसान प्रिये, तुम तो मेरे मीत प्रिये, जीवन का संगीत प्रिये.
टिप्पणियाँ
क्या बादल में ही
छिप कर रह जायेंगे ,
या जमीं को भी
कभी हसीं बनायेंगे l
जरुर बनायेंगे ...बस हम अपना सार्थक प्रयास करते रहें ....!
जब भी कोशिश की
पकड़ने की
वक़्त छीन ले गया ,
एक पल को
रूकने नही दिया
waah !
सादर
पकड़ने की
वक़्त छीन ले गया ,
एक पल को
रूकने नही दिया...बहुत खूबसूरती से अपने भावो को सजाया है....
क्या बादल में ही
छिप कर रह जायेंगे .........
मन में प्रबल इच्छा हो तो एक दिन सपने पूरे होते हैं ..हौसले बुलंद रखीये..
बहुत सुन्दर रचना सार्थक |
MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......
क्या बादल में ही
छिप कर रह जायेंगे ,
या जमीं को भी
कभी हसीं बनायेंगे...
कितनी खूबसूरती से कही है ये बात...
ज्योति जी, बहुत बहुत बधाई.
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
क्या बादल में ही
छिप कर रह जायेंगे ........
बेहद उम्दा रचना
apka mere is blog par bhi swagat hai.
http://anamka.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html
मन मोहक इन्द्रधनुषी रंग प्रस्तुत कर दिया है.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.